आज सावन का तीसरा सोमवार है और इस दिन भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आज सावन सोमवार के साथ मासिक विनायकी चतुर्थी और अंदल जयंती का पर्व भी मनाया जाएगा। सावन मास स्वयं में शिवजी को समर्पित है और प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों को विशेष कृपा प्राप्त होती है। सावन के तीसरे सोमवार को विशेष रूप से मध्यम ऊर्जा का समय कहा गया है। यह न तो अत्यंत आरंभिक है, न पूर्ण अंत की ओर, इसलिए यह संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। साथ ही आज कई शुभ योग भी बन रहे हैं और इन शुभ योग में शिव-पार्वती का पूजन करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं सावन सोमवार पूजा विधि, महत्व, मंत्र और आरती…
सावन सोमवार व्रत का महत्व
आज सावन का तीसरा सोमवार है और यह दिन व्रत और शिव पूजन के लिए बहुत उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने शिवजी को पाने के लिए सावन सोमवार का व्रत किया था। मान्यता है कि जो भक्त इस दिन व्रत रखकर श्रद्धा से शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र आदि चढ़ाते हैं, उन्हें जीवन के सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है और पाप नष्ट हो जाते हैं। सावन मास में समुद्र मंथन हुआ, जिससे हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने पी लिया। उसी के प्रतीक रूप में सावन में शिव पूजन और व्रत का विधान हुआ। यह व्रत अविवाहित कन्याओं को उत्तम वर, विवाहित स्त्रियों को अखंड सौभाग्य, और सभी को मानसिक, शारीरिक एवं आध्यात्मिक बल प्रदान करता है।
सावन सोमवार पूजन मुहुर्त 2025
अमृत काल: 10:52 ए एम से 12:33 पी एम
निशिथ काल: 29 जुलाई को 12:23 ए एम से 01:07 ए एम तक
रवि योग: 05:41 ए एम से 05:35 पी एम
परिघ योग: 28 जुलाई 03:13 ए एम से 02:54 ए एम, जुलाई 29 तक
अभिजित मुहूर्त: 12:01 पी एम से 12:55 पी एम
विजय मुहूर्त: 02:44 पी एम से 03:38 पी एम
शिववास: क्रीड़ा में – 11:24 पी एम तक
सावन सोमवार पर शुभ योग
सावन के तीसरे सोमवार पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जिससे आज के दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। आज रवि योग और शिव योग बन रहा है। साथ ही कर्क राशि में सूर्य और बुध ग्रह की युति से बुधादित्य योग बन रहा है। वहीं मिथुन राशि में शुक्र और गुरु ग्रह की युति से गजलक्ष्मी नामक शुभ योग बन रहा है। इस तरह आज 4 बेहद शुभ योग बन रहे हैं, इन शुभ योग में शिवजी की पूजा अर्चना करने से शुभ फलों की प्राप्ति होगी और ग्रहों का शुभ प्रभाव भी मिलेगा।
सावन सोमवार की पूजा विधि
आज ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान व ध्यान से निवृत्त होकर सफेद रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद पास के शिवालय में जाकर शिवलिंग को पंचामृत से अभिषेक कराएं। शिवजी को 21 बेलपत्र, धतूरा, आक, भांग, पुष्प, अक्षत चढ़ाएं और धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, चंदन, वस्त्र अर्पित करें। साथ ही मन ही मन ॐ नमः शिवाय मंत्र का जप करते रहें। इसके बाद घी के दीपक जलाकर शिव चालीसा का पाठ करें और शिव आरती करें। साथ ही रूद्राक्ष की माला से महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। आरती व जप करने के बाद भगवान शिव से प्रार्थना करें कि हे भोलेनाथ! मेरे जीवन की बाधाएं दूर करें और मुझे शुद्ध मन, स्वास्थ्य और सौभाग्य प्रदान करें। इसी विधि के साथ प्रदोष काल में भी शिवालय जाकर पूजा करें।
शिवजी के मंत्र
पंचाक्षरी मंत्र
ॐ नमः शिवाय
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यंबकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
रुद्र गायत्री मंत्र
ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
शिव ध्यान मंत्र
ॐ शंकराय महादेवाय हराय चन्द्रचूड़ाय नमः॥
बीज मंत्र
ॐ ह्रीं नमः शिवाय॥
शिवजी की आरती
सावन सोमवार की आरती-
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे ।
हंसासन गरूड़ासन, वृषवाहन साजे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
दो भुज चार चतुर्भुज, दसभुज अति सोहे ।
त्रिगुण रूप निरखते, त्रिभुवन जन मोहे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी ।
चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे ।
सनकादिक गरुणादिक, भूतादिक संगे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
कर के मध्य कमंडल, चक्र त्रिशूलधारी ।
सुखकारी दुखहारी, जगपालन कारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, जानत अविवेका ।
प्रणवाक्षर में शोभित, ये तीनों एका ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
त्रिगुणस्वामी जी की आरती, जो कोइ नर गावे ।
कहत शिवानंद स्वामी, सुख संपति पावे ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
लक्ष्मी व सावित्री, पार्वती संगा ।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा ।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला ।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
काशी में विराजे विश्वनाथ, नंदी ब्रह्मचारी ।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी ॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा ॥


