khbarworld24- नई दिल्ली – भारत की सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी 75वीं वर्षगांठ मनाई, जिसे हीरक जयंती के रूप में जाना जाता है। इस अवसर पर आयोजित समापन समारोह में प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने न्यायपालिका की तीन प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित किया। ये चुनौतियां हैं – लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, मुकदमेबाजी की लागत में वृद्धि, और वकीलों में ईमानदारी की कमी। सीजेआई खन्ना ने कहा, “जहां झूठ का बोलबाला हो, वहां न्याय संभव नहीं है,” यह टिप्पणी उन्होंने भारतीय न्याय व्यवस्था के मौजूदा मुद्दों पर की, जो न्याय की उपलब्धता और निष्पक्षता पर गहरा असर डाल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट: एक ‘जन-अदालत’ के रूप में विकसित संस्थान
सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट के सफर को दशकों में विभाजित कर, इसके विकास को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट न केवल एक अचल इमारत है, बल्कि यह एक ‘सांस लेने वाली जीवित संस्था’ है, जो देश की नब्ज को प्रतिबिंबित करती है। सीजेआई ने अदालत की भूमिका पर जोर देते हुए इसे एक ‘सच्ची जन-अदालत’ बताया, जो जनता के न्याय की प्रतीक बन चुकी है। इसके अलावा, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को विकासशील कानूनी ढांचे और देश की बदलती परिस्थितियों का दर्पण बताया।
सुप्रीम कोर्ट के सामने तीन बड़ी चुनौतियां
सीजेआई खन्ना ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष तीन प्रमुख चुनौतियों की चर्चा की, जो इस प्रकार हैं:
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लंबित मामलों की बढ़ती संख्या:
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। 2024 के अंत तक 68,365 से अधिक मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित थे। इन लंबित मामलों के कारण न्याय प्रक्रिया में देरी हो रही है, जिससे आम जनता को न्याय प्राप्त करने में कठिनाई हो रही है। -
मुकदमेबाजी की बढ़ती लागत:
मुकदमेबाजी की बढ़ती लागत भी एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है। 2023 के एक सर्वेक्षण के अनुसार, 65% से अधिक लोग न्यायालय में मामलों को लड़ने के खर्चों को वहन करने में असमर्थ हैं। न्यायालय की प्रक्रिया और वकीलों की फीस में बढ़ोतरी ने इसे आम आदमी की पहुंच से बाहर कर दिया है, जिससे न्याय तक समान पहुंच प्रभावित हो रही है। -
वकीलों में ईमानदारी की कमी:
सीजेआई ने वकीलों में ईमानदारी की कमी पर भी चिंता जताई। न्यायपालिका में ईमानदारी और नैतिकता का अभाव, विशेषकर वकीलों में, न्याय प्रक्रिया को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना देता है। इस समस्या के कारण मुकदमों का सही निष्पादन बाधित हो रहा है, जिससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कम हो रहा है।
सुप्रीम कोर्ट का विकास: दशकों की कहानी
सीजेआई संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के विकास को उसके विभिन्न दशकों में बांटकर बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक दशक देश की चुनौतियों और न्यायालय के दृष्टिकोण को परिलक्षित करता है।
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प्रथम दशक: सूर्योदय का वर्ष (1950-1960):
यह दशक एक नव स्वतंत्र भारत के लिए संविधान के मूल्यों और नैतिकता को मूर्त रूप देने का समय था। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण भूमि संबंधी मामलों पर निर्णय दिए, जैसे कि रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और दरियाओ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (जीवन के अधिकार पर प्रतिबंध)। -
दूसरा दशक: खोज का वर्ष (1960-1970):
इस दशक में न्यायालय को यह व्याख्या करने का कार्य सौंपा गया कि क्या संविधान के अनुच्छेद 13 में प्रयुक्त ‘कानून’ शब्द में संवैधानिक संशोधन भी शामिल है। इस दशक के फैसले देश के संविधान की ताकत और उसकी लचीलेपन को परिभाषित करने में मददगार साबित हुए।
सुप्रीम कोर्ट: एक वैश्विक उदाहरण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 75 वर्षों के सफर में देश के संविधान और जनता के विश्वास को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सीजेआई ने कहा, “सुप्रीम कोर्ट केवल कानूनी फैसलों का मंच नहीं है, बल्कि यह देश की आत्मा और उसके विकास का प्रतिबिंब है।”
आंकड़ों के साथ सुप्रीम कोर्ट की चुनौतियां (2024)
| चुनौती | विवरण | आंकड़े |
|---|---|---|
| लंबित मामले | सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या | 68,365 (2024 के अंत तक) |
| मुकदमेबाजी की लागत | बढ़ती लागत के कारण 65% से अधिक लोग मुकदमेबाजी का खर्च वहन करने में असमर्थ | औसतन ₹50,000 से ₹1 लाख तक की लागत प्रति मामला (वकील, कोर्ट फीस आदि) |
| वकीलों में ईमानदारी की कमी | वकीलों में नैतिकता और ईमानदारी का अभाव, जो न्याय प्रक्रिया को प्रभावित कर रहा है | इस पर कोई निश्चित आंकड़ा नहीं, लेकिन बढ़ते मामलों और देरी से इसका संकेत मिलता है |
सीजेआई ने आशा जताई कि इन चुनौतियों से निपटने के लिए भविष्य में सुधार होंगे, जिससे भारतीय न्यायपालिका और सुदृढ़ होगी।
बालकृष्ण साहू – सोर्स विभिन्न न्यूज़ आर्टिकल

