KWNS – रायपुर। छत्तीसगढ़, खनिज संपदा से भरपूर राज्य होने के बावजूद, अपने ही खनिजों से अधिकतम आर्थिक लाभ लेने की चुनौती का सामना कर रहा है। विशेष रूप से इस्पात और स्पंज आयरन उद्योग, जो राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, आज कच्चे माल—लौह अयस्क—की कमी से जूझ रहे हैं। यह विडंबना है कि देश के सबसे बड़े इस्पात उत्पादक राज्यों में से एक होने के बावजूद, यहां के स्थानीय उद्योगों को अपनी स्थापित क्षमता के अनुरूप लौह अयस्क नहीं मिल पा रहा है।
वर्तमान में, छत्तीसगढ़ में इस्पात उत्पादन की कुल स्थापित क्षमता लगभग 25 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) है, जबकि लौह अयस्क की कुल आवश्यकता 55 MTPA है। इसके मुकाबले, आपूर्ति केवल 40 MTPA तक सीमित है, जिससे लगभग 15 MTPA का महत्वपूर्ण अंतर बना हुआ है। यह कमी न केवल मौजूदा इकाइयों के संचालन को प्रभावित कर रही है, बल्कि राज्य में नए निवेश और क्षमता विस्तार को भी हतोत्साहित कर रही है।
*ओडिशा मॉडल:* एक समाधान
इस गंभीर समस्या का समाधान पड़ोसी राज्य ओडिशा के सफल मॉडल में निहित है। ओडिशा सरकार ने एक *प्री-एम्प्शन (प्राथमिकता खरीद)* नीति लागू की है, जिसके तहत राज्य में उत्पादित कुल लौह अयस्क का 50% तक हिस्सा राज्य की ही औद्योगिक इकाइयों के लिए आरक्षित कर दिया गया है। इस दूरदर्शी कदम ने ओडिशा के उद्योगों को कच्चे माल की स्थिर और सुनिश्चित आपूर्ति प्रदान की है, जिसके परिणामस्वरूप वहां औद्योगिक विकास को अभूतपूर्व गति मिली है।
छत्तीसगढ़ के लिए भी ऐसी ही एक नीति नितांत आवश्यक है। जब राज्य में उत्पादित लौह अयस्क का उपयोग स्थानीय रूप से इस्पात बनाने में किया जाता है, तो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) पर इसका आर्थिक प्रभाव लगभग दस गुना बढ़ जाता है। यह इसलिए होता है क्योंकि खनन, परिवहन, प्रसंस्करण और मूल्य-वर्धित इस्पात निर्माण की पूरी श्रृंखला में स्थानीय रोजगार उत्पन्न होते हैं और राज्य को करों, रॉयल्टी और शुल्कों के रूप में कहीं अधिक राजस्व प्राप्त होता है।
वैधानिक समर्थन और प्रस्तावित ढाँचा
प्री-एम्प्शन नीति का आधार कमजोर नहीं है। केंद्र सरकार के *खनिज रियायत नियम, 2016 (MCR-2016) के नियम 12(i)* स्पष्ट रूप से राज्य सरकार को सार्वजनिक उद्देश्य और राज्य के आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए किसी भी खनन पट्टे से निकाले गए खनिज को बाजार दर पर पहले खरीदने का *वैधानिक अधिकार* प्रदान करते हैं।
इस कानूनी शक्ति का उपयोग करते हुए, छत्तीसगढ़ सरकार को तत्काल ओडिशा की तर्ज पर एक *वैधानिक आदेश (Statutory Regulatory Order)* जारी करना चाहिए, जिसके तहत:
राज्य में उत्पादित कुल लौह अयस्क का *50% तक* हिस्सा स्थानीय इस्पात एवं स्पंज आयरन इकाइयों के लिए आरक्षित किया जाए।
इस आरक्षित अयस्क का मूल्य *भारतीय खान ब्यूरो (IBM) के औसत मूल्यों* से जोड़ा जाए, ताकि मूल्य निर्धारण निष्पक्ष और बाजार-संरेखित हो।
इस नीति को लागू करने से राज्य की औद्योगिक इकाइयों को स्थायी कच्चा माल उपलब्ध होगा, जिससे वे पूर्ण क्षमता पर काम कर सकेंगी। यह न केवल वर्तमान उद्योगों में क्षमता विस्तार को प्रोत्साहित करेगा, बल्कि नए निवेशकों को भी छत्तीसगढ़ की ओर आकर्षित करेगा, जिससे अंततः व्यापक रोज़गार सृजन और राज्य के राजस्व में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
यह समय है जब छत्तीसगढ़ सरकार को *खनिज रियायत नियमों में निहित अपने वैधानिक अधिकारों* का उपयोग करते हुए, स्थानीय उद्योगों को प्राथमिकता देनी चाहिए। लौह अयस्क हेतु प्री-एम्प्शन नीति केवल कच्चे माल का आरक्षण नहीं है; यह छत्तीसगढ़ के दीर्घकालिक औद्योगिक और आर्थिक विकास को सुरक्षित करने का एक रणनीतिक निर्णय है। यह नीति राज्य के हित में है और इसे अविलंब लागू किया जाना चाहिए।


