खबर वर्ल्ड24-बालकृष्ण साहू-छत्तीसगढ़ । संसद का शीतकालीन सत्र 25 नवंबर से आरंभ होकर 20 दिसंबर तक चलेगा। इस सत्र के दौरान सरकार ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ विधेयक और वक्फ संशोधन विधेयक भी पेश कर सकती है, जिसकी समीक्षा फिलहाल जेपीसी कर रहा है। हाल ही में, पीएम मोदी ने संकेत दिया था कि सरकार ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ की दिशा में काम कर रही है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव लाएगा।

शीतकालीन सत्र में “एक राष्ट्र, एक चुनाव” (One Nation, One Election) बिल पेश होने की संभावना एक बड़ा राजनीतिक और संवैधानिक कदम हो सकता है। अगर इस सत्र में इसे पेश किया जाता है, तो यह भारत की चुनाव प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” का विचार यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं, ताकि चुनावी खर्चों और प्रशासनिक जटिलताओं को कम किया जा सके। यह प्रणाली देशभर में बार-बार होने वाले चुनावों से निजात दिला सकती है और सरकारों को अधिक स्थिरता दे सकती है, क्योंकि इस प्रणाली में चुनाव एक निर्धारित समय पर ही होंगे।
हालांकि, इस प्रस्ताव पर देश में मिश्रित प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं। जहां कुछ लोग इसे एक सकारात्मक कदम मानते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ इसे चुनौतीपूर्ण मान सकते हैं, क्योंकि इससे राज्यों की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है और संविधान में बदलाव की आवश्यकता पड़ सकती है।
इस शीतकालीन सत्र में, अगर यह बिल पेश होता है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि विभिन्न राजनीतिक दल और नागरिक समाज इसके प्रति क्या रुख अपनाते हैं।

फायदे:
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चुनावी खर्च में कमी:
- एक साथ चुनाव कराने से सरकार और राजनीतिक दलों दोनों के चुनावी खर्च में भारी कमी आ सकती है। बार-बार होने वाले चुनावों के लिए अलग-अलग संसाधनों और सुरक्षा व्यवस्था पर खर्चा नहीं करना पड़ेगा।
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गवर्नेंस में स्थिरता:
- एक ही बार चुनाव होने से सरकारें अपने पूरे कार्यकाल के दौरान नीतिगत निर्णय लेने में स्वतंत्र होंगी, क्योंकि बार-बार आचार संहिता लागू नहीं होगी, जिससे विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे।
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प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार:
- चुनाव कराने में प्रशासनिक संसाधनों और सुरक्षा बलों की भारी मात्रा में तैनाती की आवश्यकता होती है। एक साथ चुनाव से इन संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।
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चुनावी दबाव से राहत:
- बार-बार चुनावी माहौल होने से राजनीतिक दलों और सरकारों पर जनसमर्थन बनाए रखने का दबाव होता है, जो दीर्घकालिक नीतिगत निर्णयों पर असर डाल सकता है। एक साथ चुनाव होने से सरकारें इस दबाव से मुक्त होकर दीर्घकालिक फैसले ले सकेंगी।
नुकसान:
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संवैधानिक और कानूनी चुनौतियां:
- “एक राष्ट्र, एक चुनाव” लागू करने के लिए संविधान में संशोधन की जरूरत होगी, क्योंकि वर्तमान में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल अलग-अलग समय पर समाप्त होते हैं। यह प्रक्रिया जटिल और विवादास्पद हो सकती है।
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राज्यों की स्वायत्तता पर असर:
- राज्यों की विधानसभाएं स्वतंत्र संस्थाएं हैं, और इस प्रणाली से उनकी स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है। अगर किसी राज्य की सरकार गिर जाती है, तो वहां दोबारा चुनाव कब कराए जाएंगे, यह बड़ा सवाल हो सकता है।
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स्थानीय मुद्दों पर ध्यान कम:
- एक साथ चुनाव होने पर राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय मुद्दे एक साथ आ सकते हैं। ऐसे में राज्य स्तर के स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय मुद्दों के सामने गौण हो सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय दलों और उनकी समस्याओं की उपेक्षा हो सकती है।
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राजनीतिक विविधता पर प्रभाव:
- एक साथ चुनाव का मतलब है कि मतदाता एक ही समय में राष्ट्रीय और राज्य चुनाव के लिए वोट देंगे, जिससे राष्ट्रीय दलों को फायदा हो सकता है और क्षेत्रीय दलों की पहचान कमजोर हो सकती है।
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सरकार गिरने की स्थिति:
- अगर एक राज्य की सरकार कार्यकाल के बीच में गिर जाती है, तो उस राज्य में क्या तत्काल चुनाव होंगे या राज्यपाल के अधीन चलाया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। इससे राजनीतिक अस्थिरता का खतरा बढ़ सकता है।
“एक राष्ट्र, एक चुनाव” के फायदे जैसे कि चुनावी खर्च में कमी और गवर्नेंस में स्थिरता, इसके पक्ष में मजबूत तर्क हो सकते हैं, लेकिन संविधान में संशोधन और राज्यों की स्वायत्तता पर असर इसके विरोध में बड़े मुद्दे हैं। इसे लागू करने के लिए व्यापक चर्चा और सहमति की आवश्यकता होगी।