22 सितंबर को आज परिवर्तिनी एकादशी है। परिवर्तिनी एकादशी की कथा में भगवान वामन और राजा बलि का प्रसंग प्रमुख रूप से आता है। इसी कारण इस दिन विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा की परंपरा जुड़ी हुई है। इस दिन पूजा में परिवर्तिनी एकादशी कथा का पाठ करें, मान्यता है इस एकादशी के प्रताप से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ करने के समान फल मिलता है।
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! अब तुम समस्त पापों का शमन करने वाली इस कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करो। त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था। वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदा यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में देवेन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा।
देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन नहीं कर सके और भगवान श्रीहरि के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना करने लगे। अन्त में मैंने वामन रूप धारण किया तथा तेजस्वी ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।यह सुनकर अर्जुन ने कहा आपने वामन रूप धारण करके उस बलि को किस प्रकार जीता, कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक बताइये।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा मैंने वामन रूप धारण करके राजा बलि से याचना की तुम मुझे तीन पग भूमि दान दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा।राजा बलि ने इस छोटी सी याचना को स्वीकार कर लिया तथा भूमि दान करने को तैयार हो गया। जब उसने मुझे वचन दे दिया, तब मैंने अपना आकार बढ़ाया और भूलोक में पग, भुवनलोक में जङ्घा, स्वर्गलोक में कमर, महलोक में उदर, जनलोक में हृदय, तपलोक में कण्ठ तथा सत्यलोक में मुख रखकर अपने शीर्ष को ऊँचा उठा लिया।
उस समय सूर्य, नक्षत्र, इन्द्र तथा अन्य देवता मेरी स्तुति करने लगे। तब मैंने राजा बलि से पूछा कि हे राजन्! अब मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ? इतना सुनकर राजा बलि ने अपना शीर्ष नीचे कर लिया। तब मैंने अपना तीसरा पग उसके शीर्ष पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिये मैंने अपने उस असुर भक्त को पाताललोक में पहुँचा दिया। उस समय वह मुझसे विनती करने लगा।
मैंने उससे कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा। भादों के शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी नामक एकादशी के दिन मेरी एक प्रतिमा राजा बलि के समीप रहती है तथा एक क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करती रहती है। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु शयन करते हुये करवट बदलते हैं।
इस दिन त्रिलोकीनाथ भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसमें चावल एवं दही सहित चाँदी का दान दिया जाता है। इस दिन रात्रि को जागरण करना चाहिये। इस प्रकार उपवास करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर स्वर्गलोक को जाता है। जो मनुष्य पापों को नष्ट करने वाली इस एकादशी व्रत की कथा सुनते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है।
Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। यहां यह बताना जरूरी है कि K.W.N.S. किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें।
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