भगवान शिव के प्रिय मास सावन में कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व है और इस पवित्र माह में चारों तरह शिव भक्त कांवड़ लेकर बम बम भोले के जयकारे लगाते हुए मुक्तिदायक यात्रा पर निकलते हैं। कांवड़िए पवित्र नदियों से जल भरकर पैदल अपने गंतव्य की ओर रवाना होते हैं और शिवलिंग पर उस जल से अभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि सावन में कांवड़ से लाया गया गंगाजल भगवान शिव को अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महादेव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। साथ ही व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। चूंकि कांवड़ यात्रा शुरू हो चुकी है तो कई लोगों के मन में सवाल रहता है कि यह यात्रा कब तक चलती है और इस पवित्र यात्रा का समापन कब होता है।
सावन शिवरात्रि पर कांवड़ यात्रा का समापन – ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस बार पवित्र सावन महीने की शुरुआत 30 जुलाई दिन गुरुवार से हो चुकी थी और इसी दिन से कांवड़ यात्रा का प्रारंभ भी हो गया था। वहीं इस पवित्र यात्रा का समापन सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि यानी सावन शिवरात्रि के दिन होता है और इस बार यह शुभ तिथि 11 अगस्त दिन मंगलवार को होगा। इस बार 10 अगस्त को सावन का दूसरा सोमवार है, जबकि 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि के अवसर पर कई स्थानों पर कांवड़ यात्रा का समापन होगा। हालांकि कुछ क्षेत्रों में पूरे सावन कांवड़ यात्रा चलती रहती है। शिवरात्रि के करीब आते ही कांवड़ियों की संख्या बढ़ने लगती है। कंधों पर कांवड़ उठाए भक्त हर हर महादेव और बम बम भोले के जयकारे लगाते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ते नजर आते हैं। इस दौरान वातावरण पूरी तरह शिवमय हो जाता है।
कांवड़ यात्रा क्यों है खास? – धार्मिक मान्यता के अनुसार, सावन मास में कांवड़ यात्रा का संबंध भगवान शिव की आराधना और जलाभिषेक से है। कांवड़िए पवित्र नदी से जल लेकर उसे कांवड़ में सुरक्षित रखते हैं और यात्रा पूरी होने के बाद शिव मंदिर में पहुंचकर महादेव का अभिषेक करते हैं। माना जाता है कि सावन में जलाभिषेक करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक यात्रा ही नहीं बल्कि आस्था, अनुशासन और संकल्प का प्रतीक भी मानी जाती है। कई कांवड़िए यात्रा के दौरान कठिन नियमों का पालन करते हैं।
शिवरात्रि पर बढ़ेगी मंदिरों में भीड़ – 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि के अवसर पर शिव मंदिरों में भक्तों की संख्या बढ़ने की संभावना रहती है। कांवड़िए भी जल लेकर मंदिरों की ओर बढ़ते हैं। सुबह से ही मंदिरों में जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो जाता है। कई जगह मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। सावन की कांवड़ यात्रा भक्त और भगवान के बीच आस्था और समर्पण का प्रतीक मानी जाती है। कांवड़ियों के जयकारों से गूंजता वातावरण इस बात का संदेश देता है कि महादेव की भक्ति में कठिन रास्ते भी भक्तों के लिए आसान हो जाते हैं।
रास्तों पर बढ़ सकता है यातायात दबाव – कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सुविधा को देखते हुए कई स्थानों पर यातायात व्यवस्था में बदलाव किया जाता है। कुछ रास्तों पर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित या डायवर्ट की जा सकती है। कांवड़ यात्रा के अंतिम दिनों और शिवरात्रि के आसपास बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के सड़कों पर होने से लोगों को भारी जाम का सामना भी करना पड़ सकता है। ऐसे में यात्रियों को घर से निकलने से पहले मार्ग और यातायात व्यवस्था की जानकारी लेना उचित रहेगा।
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