व्यास पाठक-रायपुर। पत्रकारिता गले में टँगा कोई पोस्टर नहीं है, बल्कि यह एक पत्रकार के होने का ढंग और दायित्वबोध है।” यह पंक्तियाँ आज के उस दौर में बेहद मौजूं हो जाती हैं जहाँ मीडिया केवल सूचनाओं का माध्यम न रहकर एक बड़े कॉरपोरेट और टीआरपी (TRP) के जाल में उलझ गया है। यदि पत्रकारिता को ‘योग’ मान लिया जाए—जहाँ व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और इंद्रिय सुखों का विसर्जन कर केवल ‘अशेष’ (कल्याणकारी) को जन्म देने का संकल्प हो—तो समाज से भेदभाव, गरीबी, बीमारी और भय के अंधेरे को मिटाया जा सकता है।
‘अंधेरे और भय’ के खिलाफ पत्रकारिता की सुरक्षा
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प्रेस फ्रीडम इंडेक्स: ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (RSF) द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान लगातार चुनौतीपूर्ण बना हुआ है (अक्सर 150वें से 160वें पायदान के बीच)।
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जोखिम: पिछले एक दशक के आँकड़े बताते हैं कि भारत में फील्ड पर काम करने वाले दर्जनों पत्रकारों को अपनी जान गंवानी पड़ी या उन्हें कानूनी मुकदमों (SLAPP lawsuits) का सामना करना पड़ा।
“खर-पतवार” के बीच ‘कल्पवृक्ष’ की उम्मीद
संदेश में एक बेहद खूबसूरत बात कही गई है—“खर-पतवार होने से खेत की जमीन का स्वरूप नहीं बदलता।” आज मीडिया जगत में सनसनीखेज खबरें, टीआरपी की अंधी दौड़ और पेड-न्यूज भले ही ‘खर-पतवार’ की तरह उग आए हों, लेकिन पत्रकारिता की मूल जमीन आज भी उपजाऊ है।
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सकारात्मक बदलाव (Positive Journalism): आज देश में ‘रूरल जर्नलिज्म’ (जैसे गाँव कनेक्शन) और स्वतंत्र डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की बाढ़ आई है।
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प्रभाव: इन कल्पवृक्ष रूपी प्रयासों के कारण ही दूर-दराज के गांवों में पीने का पानी, स्वास्थ्य सुविधाएँ और सरकारी योजनाओं का लाभ पहुँच रहा है। सूचना के अधिकार (RTI) और खोजी पत्रकारिता के दम पर पिछले सालों में कई हजार करोड़ के घोटालों का पर्दाफाश हुआ है, जिससे समाज में ‘अंधेरा’ कम हुआ है।


