khabarworld24.com -सुप्रीम कोर्ट सेम सेक्स मैरिज (समलैंगिक विवाह) को लेकर दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। यह याचिकाएं उस ऐतिहासिक फैसले के बाद दायर की गई हैं, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने से मना कर दिया था। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि विवाह से जुड़े कानून बनाना अदालत का नहीं, बल्कि संसद का अधिकार क्षेत्र है। इस मुद्दे पर कोर्ट ने संविधान और लोकतंत्र की सीमाओं का पालन करते हुए संसद को यह निर्णय लेने की जिम्मेदारी सौंपी थी।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और तर्क
17 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग खारिज कर दी थी। पांच जजों की पीठ में से चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल, जस्टिस रवींद्र भट्ट, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस पीएस नरसिम्हा शामिल थे। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में सेम सेक्स मैरिज को सम्मिलित करना संविधान के मौलिक ढांचे का हिस्सा नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यह मुद्दा विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने और संपत्ति अधिकार जैसे सामाजिक एवं कानूनी विषयों से जुड़ा है, और इन पर कानून बनाना संसद का दायित्व है।
पुनर्विचार याचिकाएं: अदालत से फिर उम्मीद
फैसले के खिलाफ कई पक्षों ने पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की हैं, जिसमें उन्होंने अदालत से अपील की है कि वह अपने निर्णय पर पुनर्विचार करे। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता न देना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि यह LGBTQ+ समुदाय के लोगों के समान अधिकारों के लिए आवश्यक है। उनका मानना है कि यह फैसला समानता और गैर-भेदभाव के सिद्धांत के खिलाफ है।
LGBTQ+ समुदाय की मांग और संसद का रुख
सेम सेक्स मैरिज के मुद्दे पर LGBTQ+ समुदाय लंबे समय से लड़ाई लड़ रहा है। समुदाय का कहना है कि संविधान के तहत सभी नागरिकों को समान अधिकार दिए गए हैं, और विवाह का अधिकार भी सभी को मिलना चाहिए, चाहे वे किसी भी लिंग या यौनिकता के हों। हालांकि, संसद और सरकार ने इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि भारतीय समाज और संस्कृति के मद्देनजर विवाह के पारंपरिक स्वरूप में बदलाव करना फिलहाल संभव नहीं है।
आंकड़ों में LGBTQ+ समुदाय और विवाह अधिकार
- 2018 में धारा 377 को रद्द करने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने भारत में समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, जिससे LGBTQ+ समुदाय को बड़ा कानूनी समर्थन मिला था।
- कई देश जैसे अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, और कई यूरोपीय देशों में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त है।
- भारत में लगभग 6-10% लोग LGBTQ+ समुदाय का हिस्सा माने जाते हैं, हालांकि इस पर सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि भारत में LGBTQ+ से जुड़े मुद्दों पर विस्तृत जनगणना या सर्वेक्षण नहीं हुआ है।
समलैंगिक विवाह पर समाज का दृष्टिकोण
भारत में समलैंगिक विवाह पर समाज का नजरिया अब भी विभाजित है। एक तरफ जहां युवा पीढ़ी और शहरी क्षेत्रों में LGBTQ+ समुदाय के प्रति सहानुभूति और समर्थन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में इसे लेकर अब भी संकोच और विरोध की स्थिति है। समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि विवाह एक धार्मिक और सांस्कृतिक संस्था है, जिसमें समलैंगिकता का स्थान नहीं है।
आगे का रास्ता
आज की सुनवाई के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार याचिकाओं पर क्या फैसला सुनाती है। क्या अदालत अपने पुराने फैसले को बरकरार रखेगी या LGBTQ+ समुदाय की मांगों को ध्यान में रखते हुए कुछ राहत देगी?
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत का निर्णय भारतीय न्याय प्रणाली और लोकतंत्र के ढांचे के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा।
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