खबर वर्ल्ड न्यूज-शिव तिवारी-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ की न्याय व्यवस्था, पुलिस प्रशासन और अदालतों की कार्यशैली में एक बड़ा संवेदनशील बदलाव लागू होने जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत बिलासपुर हाई कोर्ट ने राज्य की सभी जिला अदालतों, पुलिस विभाग और संबंधित प्रशासनिक अंगों के लिए नई गाइडलाइन जारी की है। इस पहल का मुख्य उद्देश्य यौन उत्पीड़न व संवेदनशील मामलों की सुनवाई के दौरान पीड़ित और गवाहों की गरिमा बनाए रखना तथा कानूनी दस्तावेजों से रूढ़िवादी और आपत्तिजनक भाषा को पूरी तरह समाप्त करना है।
प्रशासनिक दायरे में 24 जिला अदालतें और 3 प्रमुख विभाग शामिल
हाई कोर्ट ने इस आदेश की प्रति राज्य के सभी प्रशासनिक और न्यायिक विभागों को भेजकर इसका तत्काल प्रभाव से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं:
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24 जिला एवं सत्र न्यायालय: प्रदेश की सभी 24 जिला अदालतों में नई शब्दावली और व्यवस्था लागू होगी।
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3 प्रमुख प्रशासनिक अंग: गृह विभाग (मुख्य सचिव), पुलिस महानिदेशक (DGP) कार्यालय, और महिला एवं बाल विकास विभाग।
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न्यायिक प्रशिक्षण संस्थान: स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी और राज्य व जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA/DALSA)।
सुप्रीम कोर्ट की 5-सदस्यीय कमेटी की सिफारिशें
यह ऐतिहासिक कदम इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक आपराधिक पुनरीक्षण मामले में की गई आपत्तिजनक टिप्पणियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिए गए स्वतः संज्ञान का परिणाम है।
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कमेटी का गठन: रिटायर्ड जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता में 5-सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया गया था।
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रिपोर्ट: समिति की रिपोर्ट ‘जजमेंट एंड जेंडर: स्टीरियोटाइप्स एंड कम्पैशन इन राइटिंग जजमेंट्स’ (Judgments & Gender: Stereotypes and Compassion in Writing Judgments) को देश की सभी अदालतों में लागू करने के आदेश दिए गए हैं।
न्याय प्रणाली में लागू की गईं 5 प्रमुख नई व्यवस्थाएं
पुराने ढर्रे के कारण निचली अदालतों और थानों में अक्सर ‘रखैल’, ‘चरित्रहीन’, ‘हवस’ या ‘लाचार महिला’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता था। इससे न केवल अपराध की गंभीरता कम होती थी, बल्कि पीड़िता को भी मानसिक उत्पीड़न झेलना पड़ता था। नई शब्दावली के लागू होने से राज्य की कानूनी प्रणाली अधिक पीड़ित-केंद्रित, भयमुक्त और गरिमापूर्ण बनेगी।


