अरब सागर के किनारे बसे सोमनाथ मंदिर में इन दिनों श्रद्धा और आस्था का अलग ही दृश्य देखने को मिल रहा है। आज यहां ‘सोमनाथ अमृत महोत्सव’ का आयोजन किया गया है, जिसमें पीएम नरेंद्र मोदी भी शामिल होने पहुंचे हैं। पुनर्निर्मित मंदिर के उद्घाटन के 75 वर्ष पूरे होने के शुभ अवसर पर यह अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है। देश के अलग-अलग तीर्थों और पवित्र नदियों से लाया गया जल भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग पर अर्पित किया जा रहा है। मंदिर में 11 स्थानों के जल से हो रहा यह विशेष जलाभिषेक सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की गहरी आध्यात्मिक सोच से जुड़ा हुआ माना जाता है।
बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस अनोखी पूजा को देखने पहुंच रहे हैं और सोशल मीडिया पर भी इसकी खूब चर्चा हो रही है। कई लोगों के मन में सवाल है कि आखिर 11 जगहों का जल ही क्यों लाया जाता है, इसका क्या महत्व है और इससे क्या फल मिलता है। इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा।
11 पवित्र जलों से अभिषेक का क्या है धार्मिक महत्व?
हिंदू धर्म में भगवान शिव का जलाभिषेक बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। मान्यता है कि जल अर्पित करने से मन की अशांति शांत होती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है। लेकिन जब अलग-अलग तीर्थों और नदियों का जल एक साथ शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है, तो उसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, 11 जल स्रोतों का संबंध भगवान शिव के 11 रुद्र स्वरूपों से जोड़ा जाता है। यही वजह है कि इस अनुष्ठान में गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी जैसी पवित्र नदियों का जल शामिल किया जा रहा है। इसके लिए विशेष क्रेन और तकनीक का सहारा लिया गया है ताकि पूरी मर्यादा के साथ अनुष्ठान संपन्न हो सके। माना जा रहा है कि इन सभी नदियों में अलग-अलग दिव्य ऊर्जा होती है और जब उनका संगम शिव अभिषेक में होता है, तो वातावरण आध्यात्मिक रूप से और अधिक शक्तिशाली बन जाता है।
शिव और जल का संबंध क्यों माना जाता है खास?
पौराणिक कथाओं में भगवान शिव को ‘जलप्रिय’ देवता कहा गया है। समुद्र मंथन के समय जब शिव ने विष पिया था, तब देवताओं ने उन्हें शांत करने के लिए जल अर्पित किया था। तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा शुरू हुई। सोमनाथ मंदिर में होने वाला यह विशेष जलाभिषेक उसी परंपरा का विस्तृत रूप माना जाता है। यहां अलग-अलग राज्यों से जल लाने वाले श्रद्धालु कई दिनों की यात्रा के बाद मंदिर पहुंचते हैं। उनके लिए यह सिर्फ पूजा नहीं बल्कि आस्था की यात्रा होती है।
आखिर इससे क्या होता है?
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस तरह का सामूहिक और विशेष जलाभिषेक व्यक्ति और समाज दोनों के लिए शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इससे नकारात्मक ऊर्जा कम होती है और वातावरण में सकारात्मकता बढ़ती है। कई श्रद्धालु इसे मानसिक शांति, परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य से भी जोड़कर देखते हैं।
हालांकि वैज्ञानिक दृष्टि से इसे आस्था और मानसिक संतुलन से जुड़ी प्रक्रिया माना जाता है। जब हजारों लोग एक साथ किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होते हैं, तो सामूहिक विश्वास और भावनात्मक जुड़ाव लोगों को मानसिक रूप से मजबूत बनाता है। यही वजह है कि ऐसे आयोजनों में लोगों को अलग तरह की शांति महसूस होती है।
कलश की विशेषता
760 किलोग्राम के इस कलश को विशेष रूप से तैयार किया गया है जो 8 फीट ऊंचा है और इसकी क्षमता 1100 लीटर है। विशाल और तकनीकी रूप से उन्नत कलश अपने आप में एक अद्भुत इंजीनियरिंग का उदाहरण है। इस पूरी संरचना का वजन 1860 किलोग्राम है।
3 मिनट में स्थापित होगा कलश
अधिकारियों के अनुसार विशाल कलश को 90 मीटर ऊंची क्रेन की सहायता से मंदिर के शिखर तक पहुंचाया जाएगा। सेंसर सिस्टम और एडवान्स्ड रिमोट कंट्रोल सिस्टम से विशाल कलश को शिखर पर स्थापित किया जाएगा। जिसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और घंटों की गूंज के बीच 11 पवित्र तीर्थों के पवित्र जल से शिखर अभिषेक संपन्न होगा।
सिर्फ पूजा नहीं, सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी
सोमनाथ में 11 जलों से होने वाला जलाभिषेक देश की सांस्कृतिक एकता का भी प्रतीक माना जाता है। अलग-अलग राज्यों और नदियों का जल एक साथ लाकर भगवान शिव को अर्पित करना यह संदेश देता है कि भारत की विविधता अंततः एक ही आध्यात्मिक धारा से जुड़ी है। दिलचस्प बात यह है कि युवा पीढ़ी भी अब ऐसे धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगी है। सोशल मीडिया पर लोग इस परंपरा के वीडियो और तस्वीरें साझा कर रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी भी इसके महत्व को समझने लगी है।
श्रद्धा, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास का संगम
सोमनाथ मंदिर में 11 स्थानों के जल से होने वाला जलाभिषेक केवल धार्मिक रस्म नहीं है। यह श्रद्धा, आध्यात्मिक ऊर्जा और भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाने वाली परंपरा है। कोई इसे धार्मिक आस्था मानता है, तो कोई मानसिक शांति का माध्यम, लेकिन करोड़ों लोगों के लिए यह भगवान शिव से जुड़ने का एक खास तरीका है। यही वजह है कि सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत दिखाई देती है।
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