वैशाख की मासिक कालाष्टमी आज 10 अप्रैल को है। हर माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कालाष्टमी का व्रत रखा जाता है और काल भैरव की पूजा करते हैं। काल भैरव भगवान शिव के रुद्रावतार हैं। इनकी पूजा करने से सभी प्रकार के दोष मिट जाते हैं, शनि, राहु, केतु परेशान नहीं करते हैं और तो और अकाल मृत्यु का भय भी दूर भाग जाता है। आज मासिक कालाष्टमी के दिन जब आप काल भैरव की पूजा करें तो काल भैरव अष्टकम् का पाठ करें। इस पाठ की रचना आदिशंकराचार्य ने की थी। इस शक्तिशाली स्तोत्र में काल भैरव की स्तुति है। इसका पाठ करने से काल भैरव प्रसन्न होते हैं, उनकी कृपा से नकारात्मकता दूर होती है, वे व्यक्ति को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। काल भैरव अष्टकम् संस्कृत में लिखा हुआ है, यदि आप पढ़ पाएं तो उत्तम है, न पढ़ पाएं तो इसके ऑडियो को सुनकर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
वैशाख मासिक कालाष्टमी 2026 मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण अष्टमी तिथि का प्रारंभ 9 अप्रैल गुरुवार को रात 09:19 पी एम से हुआ है और यह तिथि 10 अप्रैल को 11:15 पी एम तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर मासिक कालाष्टमी व्रत आज है।
इस दिन का ब्रह्म मुहूर्त 04:31 ए एम से 05:16 ए एम तक है, वहीं अभिजीत मुहूर्त 11:57 ए एम से लेकर दोपहर 12:48 पी एम तक है।
काल भैरव अष्टकम् पाठ
देवराज सेव्यमान पावनाङ्घ्रि पङ्कजं
व्यालयज्ञ सूत्रमिन्दु शेखरं कृपाकरम्।
नारदादि योगिवृन्द वन्दितं दिगंबरंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥ 1॥
भानुकोटि भास्वरं भवाब्धितारकं परंनीलकण्ठम्
ईप्सितार्थ दायकं त्रिलोचनम्।
कालकालम् अंबुजाक्षम् अक्षशूलम्
अक्षरंकाशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥2॥
शूलटङ्क पाशदण्ड पाणिमादि कारणंश्यामकायम्
आदिदेवम् अक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥3॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
विनिक्वणन् मनोज्ञहेमकिङ्किणी लसत्कटिंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥4॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाश मोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाश शोभिताङ्गमण्डलंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥5॥
रत्नपादुका प्रभाभिराम पादयुग्मकंनित्यम्
अद्वितीयम् इष्टदैवतं निरञ्जनम्।
मृत्युदर्पनाशनं कराळदंष्ट्रमोक्षणं
काशिका पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥6॥
अट्टहास भिन्नपद्मजाण्डकोश
सन्ततिंदृष्टिपातनष्टपाप जालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपाल मालिकन्धरंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥7॥
भूतसङ्घनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोक पुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिंकाशिका
पुराधिनाथ कालभैरवं भजे॥8॥
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम्।
शोक मोह दैन्य लोभ कोप ताप नाशनंते प्रयान्ति
कालभैरवाङ्घ्रि सन्निधिं ध्रुवम्॥9॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं संपूर्णम्॥
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