KWNS – पंडरिया (कबीरधाम) चेक बाउंस के एक महत्वपूर्ण मामले में कबीरधाम जिले के पंडरिया न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए आरोपी को दोषसिद्ध करार दिया है। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले के पंडरिया स्थित प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट श्री आलोक अग्रवाल की अदालत ने अभियुक्ता श्रीमती तारा आहूजा पति लक्ष्मण दास आहूजा तेलीबांधा रायपुर निवासी को एक वर्ष तीन माह कुल पंद्रह माह का साधारण कारावास एवं 400000/ चार लाख रुपये प्रतिकर राशि अदा करने की सजा सुनाई है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार परिवादी व्यास पाठक से अभियुक्त श्रीमती तारा आहूजा ने लगभग 400000/- चार लाख रुपए उधार लिए थे। उक्त राशि के भुगतान के लिए अभियुक्ता द्वारा 400000/- चार लाख रुपए का चेक परिवादी को प्रदान किए गए। जब परिवादी व्यास पाठक ने इन चेकों को अपने बैंक खाते में भुगतान हेतु प्रस्तुत किया, तो अभियुक्त के खाता में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण चेक बाउंस हो गया
इसके पश्चात परिवादी द्वारा नियमानुसार अभियुक्त को कानूनी नोटिस भेजा गया, किंतु नोटिस प्राप्त होने के बाद भी अभियुक्ता द्वारा न तो राशि का भुगतान किया गया और न ही कोई संतोषजनक जवाब दिया गया। विवश होकर परिवादी ने पंडरिया तहसील न्यायालय में मामला दर्ज कराया, जो प्रकरण क्रमांक 43/2021 के रूप में पंजीबद्ध हुआ। इस प्रकरण का
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने दोनों पक्षों के तर्क, प्रस्तुत दस्तावेज एवं साक्ष्यों का गहन परीक्षण किया। सुनवाई पूर्ण होने के उपरांत दिनांक 09/02/ 2026 को न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए अभियुक्त श्रीमती तारा आहूजा पति लक्ष्मण दास आहूजा को चेक अनादरण के प्रकरण में दोषसिद्ध पाया।
पंडरिया न्यायालय के विद्वान न्यायाधीश आलोक अग्रवाल ने अपने फैसले के आदेश में अभियुक्त को एक वर्ष 3माह साधारण कारावास की सजा सुनाई तथा दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 के अंतर्गत परिवादी व्यास पाठक को कुल 800000/- आठ लाख तीस हजार रुपये प्रतिकर राशि चेक राशि का डबल अदा करने का निर्देश दिया। साथ ही न्यायालय ने यह भी स्पष्ट आदेश दिया कि यदि अभियुक्त द्वारा प्रतिकर राशि की अदायगी नहीं की जाती है, तो ऐसी स्थिति में अभियुक्त को तीन माह का अतिरिक्त साधारण कारावास पृथक से भोगना होगा। अभियुक्त की ओर से दीपक सोनी परिवादी व्यास पाठक की ओर से अधिवक्ता विजय सोनडरे ने की पैरवी।
इस निर्णय को चेक बाउंस मामलों में एक सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि इस प्रकार के फैसले से आर्थिक लेन-देन में विश्वास बना रहेगा और जानबूझकर भुगतान से बचने वालों पर अंकुश लगेगा।


