खबर वर्ल्ड न्यूज-राकेश पांडेय-जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों को एक बड़ी सौगात मिली है, जब हजारों परिवारों को उन्हें उनके पारंपरिक काबिज वन भूमि का अधिकार प्रदान किए गए हैं । यह कदम न केवल आदिवासी समुदायों की आजीविका को मजबूत कर रहा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी एक मील का पत्थर साबित हो रहा है। अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम के तहत बस्तर जिले में व्यक्तिगत वन अधिकार पट्टों के तहत 35,180 आवेदनों में से 22,775 हेक्टेयर क्षेत्र की मंजूरी दी गई है। यह पट्टे उन आदिवासियों को दिए गए हैं जो पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए हैं और अब अपनी काबिज वन भूमि का कानूनी हक पा रहे हैं । इससे वन अधिकार प्राप्त हितग्राहियों को खेती-किसानी को बढ़ावा देकर आजीविका संवर्धन में सहूलियत हो रही है।
अनुसूचित जनजाति और अन्य परम्परागत वन निवासी अधिनियम के तहत जिले में सामुदायिक वन अधिकार पट्टों के अंतर्गत 6,209 आवेदनों को मंजूरी मिली है जिसमें 24,506 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इन क्षेत्रों का स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी केन्द्र, चारागाह इत्यादि सार्वजनिक प्रयोजन के लिए उपयोग किया जा रहा है। वहीं सामुदायिक वन संसाधन अधिकार के तहत 348 आवेदनों पर 1,25,962 हेक्टेयर क्षेत्र का वितरण किया गया है। ये वनाधिकार स्थानीय समुदायों को वनोपज संग्रहण एवं जड़ी-बूटी का समुचित दोहन सहित वनों के प्रबंधन, संरक्षण और उपयोग की जिम्मेदारी मिली है, जिससे जैव विविधता की रक्षा होती है और वनों की सुरक्षा एवं प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की सहभागिता को सुनिश्चित हो रही है। साथ ही उक्त वन संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के फलस्वरूप इन वन निवासियों की आर्थिक स्थिति को सुधारने में सहायता मिल रही है। ये वनाधिकार पट्टे न सिर्फ भूमि उपयोग का अधिकार देते हैं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम बनते हैं। इससे उनके सामाजिक अधिकारों की रक्षा होने सहित विकास योजनाओं में उनकी भागीदारी बढ़ी है। वहीं सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षण करने में व्यापक पैमाने पर मदद मिल रही है।
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