‘घर वापसी’ की पहल तेज
खबर वर्ल्ड न्यूज-राकेश पांडेय-जगदलपुर। बस्तर जिले में सिड़मुर गांव के सुंदरादेवी मंदिर के पास अवैध इसाई धर्मांतरण के विरुद्ध ग्रामीणों लगाए गए बोर्ड पर साफ-साफ चेतावनी दी गई है, कि पास्टर और पादरी एवं बाहर से आये धर्मांतरित लाेंगाें का गांव में प्रवेश पर राेक लगा दी है। यह बस्तर के गांव में हो रहे इसाई धर्मांतरण के विरुद्ध ग्रामीणों में पनपते जनाक्रोश को दर्शाता है। भतरा जनजातीय बहुल 270 परिवार के सिड़मुर गांव में हुई ग्राम सभा की बैठक में एकमत होकर ईसाई मिशनरियों और उनसे जुड़े लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है । इस गांव में ग्रामीणों का कहना है कि अब हमारी संस्कृति, परंपरा और देवगुड़ियों की रक्षा हम स्वयं करेंगे। बस्तर अंचल में सिड़मुर गांव अकेला नहीं है, जहां ईसाई मिशनरियों और उनसे जुड़े लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई है । इसी तरह कांकेर जिले के नरहरपुर विकासखंड के 13 गांवों में अब तक इसी तरह के पास्टर और पादरी एवं बाहर से आये धर्मांतरित लोगों के प्रवेश पर रोक का प्रस्ताव पारित कर बोर्ड लगाये जा चुके हैं।
विदित हाे कि पांच माह पहले जामगांव में एक मतांतरित परिवार की मृत्यु के बाद गांव विवाद हुआ था। तब ग्राम सभा ने यह तय किया कि गांव की सीमाओं में बिना अनुमति कोई पास्टर या पादरी नहीं आएगा, इसका बकायदा एक बाेर्ड लगा दिया था । इस निर्णय के बाद अब अन्य गांव भी इसी राह पर चल पड़े हैं। ग्रामीणों का कहना है, हमारा विरोध किसी धर्म से नहीं, बल्कि लालच और प्रलोभन से कराए जा रहे धर्मांतरण से है, जो आदिवासी संस्कृति को खंडित कर रहा है।
सिड़मुर गांव के युवक कार्तिक गोयल का कहना है, कि आस-पास के इलाकों में चंगाई सभा और प्रार्थना के नाम पर लोगों को भय और भ्रम में डालकर धर्मांतरण कराया जा रहा है। पाकलुराम भारती का कहना है, कि अगर यह चलन यूं ही चलता रहा, तो बस्तर की हजारों साल पुरानी संस्कृति ही मिट जाएगी। ग्रामीणाें ने बताया कि सिड़मुर गांव में केवल सात परिवार धर्मांतरित हुए हैं, कुछ वर्ष पहले बलराम कश्यप की मां कुष्ठ रोग से पीड़ित थीं, पादरी ने कहा था, प्रार्थना से ठीक हो जाएंगी । बीमारी तो नहीं गई, पर अब पूरा परिवार धर्मांतरित हो गया। वहीं अब बलराम के घर के आंगन में बना पक्का चर्च गांव में विवाद का केंद्र बन गया है। हाल ही में ग्राम सभा के निर्णय के बाद धर्मांतरित परिवाराें का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया है। वहीं गांव की सीमा में अब धर्मांतरित परिवारों के शवों के दफनाने पर रोक लगा दी गई है।
इसाई धर्मांतरण के विरुद्ध ग्रामीणों द्वारा ग्राम सभाा में पारित निर्णय के अनुसार लगाए गए बोर्ड का असर दिखने लगा है, और बस्तर में घर वापसी की पहल भी गति पकड़ रही है। बस्तर जिले के नानगुर तहसील अंतर्गत अलनार पंचायत में महारा समाज की पहल पर सिड़मुर से लगे अलनार गांव में धर्मांतरित हुए एक परिवार के आठ सदस्यों में इच्छाबती, नारायण, जयमनी, कंचन, दीपिका, सविता, बनू और कुमारी ने पुनः पारंपरिक रीति से सनातन धर्म में वापसी की । ये सभी लोग पिछले 25 वर्षों से ईसाई धर्म का पालन कर रहे थे। माहरा समाज के पदाधिकारियों और नाइक-पाइक समुदाय के प्रमुखों की मौजूदगी में इन सभी लोगों का घर वापसी संस्कार संपन्न कराया गया। समाज के पदाधिकारियों का कहना है कि यह पहल आगे भी जारी रहेगी, और परगना क्षेत्र में ऐसे अन्य लोगों को भी उनके मूल धर्म में वापस लाने का प्रयास किया जाएगा। आने वाले समय में और भी लोग स्वेच्छा से वापस लौटेंगे।
महारा समाज जिला उपाध्यक्ष आकाश कश्यप ने कहा कि हम किसी से वैर नहीं चाहते, बस अपनी संस्कृति को बचाना चाहते हैं। जो लोग भ्रम में चले गए, वे वापस लौटें, समाज उनके साथ है।
छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के प्रांतीय अध्यक्ष राजाराम तोड़ेम ने कहा कि बस्तर का जनजातीय समाज अब जाग चुका है। अब गांव वाले स्वयं निर्णय ले रहे हैं कि कौन उनके बीच आ सकता है, और कौन नहीं । यह आंदोलन किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति की अस्मिता की रक्षा के पक्ष में है।


