खबर वर्ल्ड न्यूज-राकेश पांडेय-जगदलपुर। दीपावली का पर्व नजदीक आते ही बस्तर के बाजारों में रौनक लौट आई है। अब सिर्फ 5 दिन शेष हैं और लोग दीपावली की तैयारी में जुट गए हैं। हर साल की तरह इस बार भी बस्तर की दिवाली ओडिशा के कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीयों से रोशन होगी। बस्तर के स्थानीय कुम्हार जहां अपने पारंपरिक पेशे से दूर हो रहे हैं, वहीं ओडिशा के कुम्हारों को इसका बड़ा लाभ मिल रहा है। ओडिशा राज्य के नवरंगपुर जिले के सिंगसारी और कुमारगुड़ा गांवों से कुम्हार परिवार करीब 20 हजार से अधिक मिट्टी के दीये और कलाकृतियां लेकर बस्तर पहुंचे हैं। इन कारीगरों ने बताया कि वे पिछले छह से सात वर्षों से हर साल दीवाली से पहले बस्तर आकर अपने उत्पाद बेचते हैं। उन्होंने बताया कि दर्जन भर से अधिक कुम्हार 1-2 दिन में 50 हजार दिए लेकर पहुंचने वाले है। बस्तर के लोग भी अब इन दीयों को ही प्राथमिकता देने लगे हैं, जिससे ओडिशा के कुम्हारों की आमदनी में बढ़ोतरी हो रही है।
मेहनत अधिक, लाभ कम
बस्तर अंचल में मिट्टी के दीये, कलाकृतियां और पूजा सामग्री बनाने की परंपरा सदियों पुरानी रही है। दशहरे के समापन के बाद ही घरों की साफ-सफाई और सजावट के साथ मिट्टी के दीयों से घरों को सजाने की परंपरा आज भी कायम है, लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। बस्तर के कई कुम्हार परिवार अब यह काम छोड़ चुके हैं। उनका कहना है कि इस व्यवसाय में मेहनत अधिक और लाभ बहुत कम है, साथ ही शासन से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता या प्रोत्साहन न मिलने के कारण भी लोग हतोत्साहित हैं। स्थानीय कारीगरों का कहना है कि अगर शासन और प्रशासन की ओर से प्रशिक्षण, कच्चे माल की सुविधा और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो वे दोबारा इस परंपरागत कार्य को जीवित करने के लिए तैयार हैं। बस्तर की यह कला न केवल सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, बल्कि ग्रामीणों के लिए आजीविका का भी एक प्रमुख माध्यम रही है।
नगरनार में हुआ करता था टेराकोटा का नाम
कभी नगरनार गांव (जगदलपुर से 20 किमी दूर) टेराकोटा कला के लिए प्रसिद्ध था। यहां के कुम्हारों द्वारा बनाई गई मिट्टी की कलाकृतियां देश-विदेश में पहचान बना चुकी थीं। नगरनार में एनएमडीसी स्टील प्लांट बनने के बाद रोजगार के नए अवसर खुले, परंतु इससे पारंपरिक मिट्टी शिल्प को बड़ा झटका लगा। अब वहां के अधिकांश कुम्हारों ने यह काम पूरी तरह से छोड़ दिया है।
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