Khabarworld24 – संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में चल रही जलवायु परिवर्तन वार्ता में भारत की भूमिका और उसकी चिंताओं का विश्लेषण करना यह समझने के लिए महत्वपूर्ण है कि भारत जैसे विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के मुद्दों से किस प्रकार जूझ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रभावों को कम करने के लिए, इन देशों के सामने एक अनूठी चुनौती है – वे न केवल विकास की आवश्यकता को पूरा करना चाहते हैं बल्कि पर्यावरणीय दायित्वों का भी पालन करना चाहते हैं।
1. बैठक का संदर्भ और पृष्ठभूमि
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (जैसे COP सम्मेलनों) का उद्देश्य वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5°C से नीचे रखना है, जैसा कि पेरिस समझौते में तय किया गया था। 2024 की यह बैठक भी उसी दिशा में की जा रही है, जहां देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करना है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने के लिए समाधान तलाशने हैं।
भारत इस बैठक में विकासशील देशों के हितों की वकालत कर रहा है, विशेष रूप से निम्नलिखित मुद्दों पर:
2. विकासशील देशों की विशेष चिंताएँ
-
उत्सर्जन में असमानता: विकसित देशों ने ऐतिहासिक रूप से अधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन किया है, जबकि विकासशील देश अभी भी अपने आर्थिक विकास के लिए उत्सर्जन पर निर्भर हैं। भारत जैसे देश इस बात पर जोर देते हैं कि जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए एक “समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारी” (Common but Differentiated Responsibilities) का सिद्धांत अपनाया जाए, जिसमें विकासशील देशों के लिए कुछ रियायतें हों।
-
जलवायु वित्त पोषण: भारत और अन्य विकासशील देश वित्तीय सहायता की मांग कर रहे हैं ताकि वे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा में निवेश कर सकें। विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु वित्त के रूप में $100 बिलियन सालाना देने का वादा किया था, लेकिन यह लक्ष्य अब तक पूरी तरह से नहीं मिला है। भारत इस मुद्दे को उठाते हुए कहता है कि पर्याप्त वित्तीय मदद के बिना विकासशील देशों के लिए अपने विकास के लक्ष्यों और जलवायु प्रतिबद्धताओं को संतुलित करना कठिन है।
-
अनुकूलन (Adaptation) और शमन (Mitigation): विकासशील देश, जिनमें भारत शामिल है, अनुकूलन पर अधिक ध्यान देने की बात कर रहे हैं। इसका मतलब यह है कि जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों (जैसे बाढ़, सूखा, और तूफान) से निपटने के लिए उन्हें समर्थन की आवश्यकता है। जबकि विकसित देश ज्यादातर शमन यानी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, विकासशील देशों का तर्क है कि अनुकूलन के बिना वे इन प्रभावों का सामना करने में सक्षम नहीं होंगे।
3. भारत की रणनीति और भूमिका
भारत ने इस सम्मेलन में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं पर अपना पक्ष रखा:
-
स्वच्छ ऊर्जा में निवेश: भारत ने यह स्पष्ट किया कि वह अपने ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही “नेशनल सोलर मिशन” जैसी योजनाओं के जरिए भारत को सोलर पावर का वैश्विक लीडर बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। इसके तहत भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है। भारत का यह तर्क है कि अगर वित्तीय और तकनीकी सहायता उपलब्ध होती है, तो वह अपनी अक्षय ऊर्जा क्षमताओं को और भी तेज़ी से बढ़ा सकता है।
-
उत्सर्जन में कमी की प्रतिबद्धता: भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को पूरा करने की प्रतिबद्धता जताई है। भारत का लक्ष्य है कि वह 2070 तक “नेट जीरो” उत्सर्जन हासिल करे। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भारत ने अपने उद्योगों, ऊर्जा क्षेत्र और परिवहन में सुधार करने की योजना बनाई है, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए वित्तीय और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है।
-
जलवायु न्याय: भारत के पर्यावरण मंत्री बार-बार यह बात उठाते हैं कि जलवायु न्याय को ध्यान में रखना जरूरी है। इसका मतलब है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन के समाधान के लिए सभी देशों को एक समान जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती। विकसित देशों को उनके ऐतिहासिक उत्सर्जन के आधार पर अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए, जबकि विकासशील देशों को उनके विकास की जरूरतों के अनुसार कुछ रियायतें दी जानी चाहिए।
4. जलवायु वित्त पर चर्चा
इस बैठक में भारत की मुख्य मांग जलवायु वित्त को लेकर रही। भारत का कहना है कि विकसित देशों द्वारा जलवायु वित्त पोषण के लिए किए गए वादे पूरी तरह से पूरे नहीं हुए हैं। विशेष रूप से, भारत निम्नलिखित मांगों को सामने रखता है:
- जिम्मेदारी की पुनर्संरचना: वित्तीय सहायता केवल एक वादे की तरह नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए ताकि विकासशील देश स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को तेजी से लागू कर सकें।
- जलवायु तकनीक में सहयोग: केवल वित्तीय मदद ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि तकनीकी सहयोग भी जरूरी है। भारत चाहता है कि विकसित देश स्वच्छ ऊर्जा, कार्बन कैप्चर, और ऊर्जा दक्षता में नई तकनीकों को साझा करें।
5. चुनौतियाँ और संभावनाएँ
हालांकि भारत और विकासशील देशों की वकालत के बावजूद, कुछ चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं:
-
विकसित देशों की सुस्ती: विकसित देशों द्वारा जलवायु वित्त पोषण को लेकर अपनी प्रतिबद्धताओं को धीमी गति से पूरा करना विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता है। बिना पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता के, विकासशील देशों के लिए अपने विकास को जलवायु-अनुकूल बनाना मुश्किल है।
-
ऊर्जा सुरक्षा बनाम पर्यावरण सुरक्षा: विकासशील देशों को एक तरफ अपने नागरिकों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है, तो दूसरी तरफ उन्हें पर्यावरण सुरक्षा को भी ध्यान में रखना है। यह संतुलन बनाना आसान नहीं है, खासकर जब देश की बड़ी आबादी अभी भी ऊर्जा तक उचित पहुंच से वंचित है।
6. निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वार्ता में भारत की भूमिका यह दर्शाती है कि भारत और अन्य विकासशील देश जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में महत्वपूर्ण खिलाड़ी हैं। वे इस बात को स्पष्ट कर रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी सिर्फ विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती, बल्कि विकसित देशों को उनके ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। जलवायु वित्त पोषण और तकनीकी सहयोग पर जोर देकर भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विकासशील देशों का विकास पर्यावरण-अनुकूल हो सके।
भारत की यह रणनीति न केवल उसे जलवायु नीतियों में अग्रणी भूमिका निभाने में सक्षम बनाती है, बल्कि वैश्विक जलवायु न्याय के सिद्धांत को भी मजबूती से आगे बढ़ाती है।
खबर वर्ल्ड न्यूज-रायपुर।-बालकृष्ण साहू

