khabarworld24 – भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन, जो हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित हुआ, भारत की मध्य एशियाई देशों के साथ आर्थिक, राजनीतिक, और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल है। इस शिखर सम्मेलन में भारत और मध्य एशियाई देशों—कजाकिस्तान, किर्गिज़स्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, और उज़्बेकिस्तान के बीच व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा, और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। आइए, इस शिखर सम्मेलन का विस्तारपूर्वक विश्लेषण करें:
1. शिखर सम्मेलन की पृष्ठभूमि:
भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच लंबे समय से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। मध्य एशिया भारत के लिए न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- भौगोलिक महत्व: मध्य एशिया भारत के पश्चिम और उत्तर में स्थित है और इसे “यूरेशियन हृदय” माना जाता है। यह क्षेत्र ऊर्जा संसाधनों से समृद्ध है और व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण मार्ग प्रदान करता है।
- रणनीतिक महत्व: भारत के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ संबंध इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह क्षेत्र अफगानिस्तान और चीन जैसे अस्थिर या प्रतियोगी क्षेत्रों से घिरा हुआ है।
- आर्थिक दृष्टिकोण: मध्य एशिया में खनिज, तेल, और गैस के बड़े भंडार हैं, जिनका उपयोग भारत अपनी बढ़ती ऊर्जा मांगों को पूरा करने के लिए करना चाहता है। इसके अलावा, व्यापार और कनेक्टिविटी के मामले में मध्य एशिया को एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा जाता है।
2. मुख्य एजेंडा और समझौते:
इस शिखर सम्मेलन का प्रमुख एजेंडा व्यापार, सुरक्षा, ऊर्जा, और कनेक्टिविटी के क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देना था। इन मुद्दों पर महत्वपूर्ण समझौतों और सहमतियों पर हस्ताक्षर किए गए।
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व्यापार और आर्थिक सहयोग: भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया। हालांकि दोनों पक्षों के बीच व्यापार की वर्तमान मात्रा कम है, भारत ने मध्य एशिया के देशों के साथ बेहतर व्यापारिक कनेक्टिविटी और पारस्परिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई है।
- इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) के तहत कनेक्टिविटी को बढ़ाने की बात की गई, ताकि भारत और मध्य एशिया के बीच माल की आवाजाही तेज और सुगम हो सके।
- भारत ने मध्य एशिया में कृषि, आईटी, फार्मास्यूटिकल्स, और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश की संभावनाओं पर भी चर्चा की।
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ऊर्जा सहयोग: मध्य एशियाई देशों में तेल और गैस के बड़े भंडार हैं। इस सम्मेलन में ऊर्जा सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया गया, खासकर गैस पाइपलाइनों और ऊर्जा के अन्य साधनों में निवेश करने के बारे में बातचीत हुई।
- भारत ने तुर्कमेनिस्तान के साथ गैस पाइपलाइन परियोजनाओं पर सहयोग बढ़ाने की संभावना पर चर्चा की।
- इसके अलावा, अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में भी साझेदारी की बात की गई, जिसमें सौर ऊर्जा और जलविद्युत शामिल हैं।
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सुरक्षा और आतंकवाद: सुरक्षा और आतंकवाद पर सहयोग इस सम्मेलन का एक प्रमुख पहलू था।
- मध्य एशिया के देशों के साथ सीमा सुरक्षा और आतंकवाद-निरोधी उपायों पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई। अफगानिस्तान में तालिबान शासन के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां बढ़ गई हैं, और भारत इन चुनौतियों से निपटने के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ निकट सहयोग करना चाहता है।
- चीन और पाकिस्तान की चुनौतियां: चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) और पाकिस्तान की भूमिका को देखते हुए भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच सुरक्षा साझेदारी और भी महत्वपूर्ण हो गई है। भारत ने आतंकवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ अपनी रणनीतियों को साझा किया और मध्य एशियाई देशों के साथ मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता जताई।
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कनेक्टिविटी और ट्रांसपोर्ट: भारत ने मध्य एशिया तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक परिवहन मार्गों पर जोर दिया।
- अफगानिस्तान में अस्थिरता और पाकिस्तान के साथ सीमित व्यापारिक संबंधों के चलते, भारत मध्य एशिया से जुड़ने के लिए चाबहार पोर्ट और अन्य कनेक्टिविटी परियोजनाओं का उपयोग कर रहा है। इसके माध्यम से भारत न केवल मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बना सकता है, बल्कि यूरोप के साथ व्यापारिक संबंधों को भी मजबूत कर सकता है।
3. भारत के लिए रणनीतिक लाभ:
यह शिखर सम्मेलन भारत के लिए कई रणनीतिक लाभ प्रदान करता है:
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ऊर्जा सुरक्षा: मध्य एशिया में तेल, गैस, और खनिज संसाधनों तक पहुंच भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत इन संसाधनों का लाभ उठाकर अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है।
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सुरक्षा और आतंकवाद-निरोध: भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने से भारत को क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और आतंकवाद का मुकाबला करने में मदद मिलेगी। अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद मध्य एशिया के देशों और भारत के बीच सुरक्षा सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
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भूराजनीतिक प्रभाव: चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच भारत के लिए मध्य एशिया के साथ संबंध मजबूत करना एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चाल है। ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के तहत चीन मध्य एशिया में भारी निवेश कर रहा है, और भारत अपनी स्वतंत्र साझेदारी के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बनाए रखना चाहता है।
4. मध्य एशियाई देशों के लिए लाभ:
मध्य एशियाई देशों के लिए भी यह शिखर सम्मेलन अत्यंत लाभकारी साबित हो सकता है:
- विकास के अवसर: भारत के साथ व्यापारिक संबंध बढ़ाने से उन्हें आर्थिक लाभ मिल सकता है, खासकर जब भारत जैसे बड़े बाजार तक उनकी पहुंच बनेगी।
- विकासशील क्षेत्रों में निवेश: मध्य एशियाई देशों को कृषि, स्वास्थ्य, और आईटी जैसे क्षेत्रों में भारत से निवेश मिलने की संभावना है, जो उनकी अर्थव्यवस्थाओं को गति देगा।
- सुरक्षा सहयोग: भारत के साथ सुरक्षा और आतंकवाद-निरोधी सहयोग से क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी, खासकर अफगानिस्तान से आने वाले खतरों के मद्देनजर।
5. भविष्य की दिशा:
इस शिखर सम्मेलन के बाद, भारत और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंधों में और प्रगति की संभावना है। इस प्रकार के आयोजन भविष्य में और गहरे सहयोग का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। साथ ही, भारत इन देशों के साथ सुरक्षा संबंधों को और मजबूत करने के लिए अपनी रणनीतिक साझेदारी को भी बढ़ा सकता है।
निष्कर्ष:
भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन दोनों पक्षों के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल है। इसने न केवल आर्थिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत किया है, बल्कि सुरक्षा और आतंकवाद-निरोधी क्षेत्रों में भी सहयोग की नई संभावनाओं को जन्म दिया है। भारत के लिए मध्य एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना और इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का लाभ उठाना अत्यंत आवश्यक है।
खबर वर्ल्ड न्यूज-रायपुर – बालकृष्ण साहू।

