#khabarworld24.com – COP29 सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के बीच जलवायु परिवर्तन वित्तीय सहायता को लेकर महत्वपूर्ण मतभेद उभर कर सामने आए हैं। विकसित देशों ने विकासशील देशों को जलवायु संकट से निपटने के लिए $300 बिलियन सालाना की सहायता का वादा किया है। हालांकि, यह राशि विकासशील देशों की अपेक्षाओं से काफी कम है, जो $1 ट्रिलियन से अधिक की सहायता की मांग कर रहे थे। यह विवाद कई प्रमुख बिंदुओं पर आधारित है:
1. विकसित देशों की प्रतिबद्धता और आलोचना:
विकसित देशों का कहना है कि $300 बिलियन की राशि जलवायु वित्तपोषण में एक महत्वपूर्ण योगदान है और इसमें सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों से वित्तीय सहायता शामिल होगी। ये राशि मुख्य रूप से ग्रीन एनर्जी प्रोजेक्ट्स, जलवायु लचीलेपन, और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के प्रयासों के लिए दी जाएगी।
लेकिन कई विकासशील देशों ने इसे “अपमानजनक” करार दिया है। उनका कहना है कि यह सहायता उनके मौजूदा और भविष्य के जलवायु संकट की गंभीरता को देखते हुए अपर्याप्त है। इन देशों का तर्क है कि विकसित देशों के औद्योगिकीकरण से होने वाले उत्सर्जन के कारण वे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं, और उनकी जलवायु आपदाओं से निपटने की क्षमताएं सीमित हैं। इसीलिए वे $1 ट्रिलियन से अधिक की मांग कर रहे थे, जिसमें नुकसान और क्षति (loss and damage) को कवर करने की भी आवश्यकता थी।
2. जलवायु न्याय का मुद्दा:
विकासशील देश “जलवायु न्याय” की बात कर रहे हैं, जिसमें यह कहा जा रहा है कि अमीर और विकसित देशों ने पिछले कई दशकों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया है और अब उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वे उन देशों की मदद करें जो जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जैसे कि छोटे द्वीपीय राष्ट्र और अफ्रीका के देश।
इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण इन देशों को बाढ़, सूखा, तूफान जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक संरचनाओं पर भारी असर पड़ रहा है। उनका दावा है कि $1 ट्रिलियन से भी अधिक की राशि ही इन संकटों का सामना करने के लिए पर्याप्त होगी।
3. वित्तीय वितरण में असमानता:
एक और बड़ा मुद्दा यह है कि विकासशील देशों को पिछले वादों के अनुसार अभी तक पूरी सहायता नहीं मिली है। उदाहरण के लिए, 2009 के कोपेनहेगन समझौते में विकसित देशों ने 2020 तक $100 बिलियन सालाना प्रदान करने का वादा किया था, लेकिन वह लक्ष्य भी पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सका। इस असमानता को देखते हुए विकासशील देशों को इस नए वादे पर भरोसा नहीं हो रहा है।
4. नुकसान और क्षति (Loss and Damage) फंड:
विकासशील देशों की मुख्य मांगों में से एक “नुकसान और क्षति” के लिए एक विशेष फंड का निर्माण था। यह फंड उन देशों के लिए होगा, जो जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे नुकसान से आर्थिक और भौतिक रूप से प्रभावित हैं। विकसित देशों ने इस पर कुछ सहमति जताई है, लेकिन इसका आकार और इसे कैसे वितरित किया जाएगा, इस पर अभी सहमति नहीं बनी है।
COP29 में यह विवाद दर्शाता है कि जलवायु वित्तपोषण पर वैश्विक सहमति हासिल करना कितना चुनौतीपूर्ण है। विकासशील देशों के लिए अधिक वित्तीय सहायता की मांग आवश्यक है ताकि वे जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर सकें, जबकि विकसित देश अपने बजट और राजनीतिक बाधाओं के कारण सीमित सहायता की पेशकश कर रहे हैं। यह एक जटिल संघर्ष है, जो आने वाले वर्षों में भी जारी रहने की संभावना है।
इस स्थिति का समाधान जलवायु वित्तपोषण के लिए अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रियाओं के निर्माण में हो सकता है, जो सभी देशों की जरूरतों को ध्यान में रखे।
खबर वर्ल्ड24-बालकृष्ण साहू-छत्तीसगढ़

