नई दिल्ली। आज के दौर में ज़्यादातर घरों में आरओ या वाटर फिल्टर लगा हुआ है और लोग यह मान लेते हैं कि अब उनका पीने का पानी पूरी तरह सुरक्षित है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? बिना यह जाने कि पानी का पीएच लेवल और टीडीएस कितना है, अगर उसका सेवन किया जाए तो वही पानी सेहत के लिए खतरा भी बन सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गलत पीएच और ज्यादा टीडीएस वाला पानी धीरे-धीरे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए केवल फिल्टर लगाना ही काफी नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता को समझना भी उतना ही जरूरी है।
जानकारी देते हुए एएमयू के एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजी विभाग में शोध कर रहे शिरजील अहमद सिद्दीकी बताते हैं कि पीने के पानी के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने स्पष्ट मानक तय किए हैं। इन मानकों के अनुसार, पीने के पानी का पीएच लेवल 6.5 से 8.5 के बीच होना चाहिए. इससे कम या ज्यादा पीएच होने पर शरीर पर अलग-अलग दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। अगर पानी का पीएच बहुत कम है, यानी पानी अधिक एसिडिक है। तो यह दांतों, पेट और पाचन तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं अगर पीएच बहुत ज्यादा है, यानी पानी ज्यादा बेसिक है। तो उसका स्वाद कड़वा हो जाता है और पेट में जलन व इरिटेशन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
शोधकर्ता का कहना है कि टीडीएस यानी टोटल डिज़ॉल्व्ड सॉलिड्स को पानी में घुले हुए तत्वों की मात्रा माना जाता है। जिसे मिलीग्राम प्रति लीटर में मापा जाता है। मानकों के अनुसार, 300 mg/L तक का टीडीएस आदर्श माना जाता है। हालांकि 150 से 500 mg/L तक का टीडीएस भी स्वीकार्य सीमा में आता है। लेकिन अगर टीडीएस इससे ज्यादा हो जाता है, तो वह नॉन-परमिसिबल कैटेगरी में आ जाता है। अधिक टीडीएस वाला पानी शरीर में अतिरिक्त सॉल्यूट्स को जमा कर सकता है। जिसका सीधा असर किडनी और अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ता है। लंबे समय तक ऐसे पानी का सेवन करने से किडनी संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
शोधकर्ता शिरजील ने कहा कि घरों में लगे आरओ और वाटर फिल्टर को सही तरीके से मैनेज करना बेहद ज़रूरी है। जिन घरों में आरओ सिस्टम है, उन्हें समय-समय पर पीएच और टीडीएस मीटर से पानी की जांच कराते रहना चाहिए। आमतौर पर सर्विस टेक्नीशियन भी इसे चेक कर देते हैं, लेकिन उपभोक्ताओं को खुद भी सतर्क रहना चाहिए। पहले आरओ सिस्टम में टीडीएस को 150 या 200 तक सीमित रखा जाता था, जिससे पानी से कई जरूरी मिनरल्स निकल जाते थे। इसका नुकसान यह होता था कि शरीर को आवश्यक खनिज तत्व नहीं मिल पाते थे। अब कंपनियों ने अपनी पॉलिसी में सुधार किया है और आरओ पानी का टीडीएस बढ़ाकर करीब 300 से 350 तक रखने की व्यवस्था की जा रही है, जो एक सकारात्मक और बेहतर कदम है।
उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति लंबे समय तक खराब टीडीएस या गलत पीएच लेवल वाला पानी पीता है और उसे इसकी जानकारी नहीं है, तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। ऐसे पानी में कई तरह के केमिकल्स मौजूद हो सकते हैं। जो शरीर में अब्ज़ॉर्ब होकर धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाते हैं। इससे न सिर्फ किडनी और लीवर जैसे वाइटल ऑर्गन्स प्रभावित हो सकते हैं, बल्कि कुछ मामलों में यह दिमाग पर भी असर डाल सकता है और न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग केवल आरओ या फिल्टर लगाने पर ही संतुष्ट न हों, बल्कि यह भी सुनिश्चित करें कि जिस पानी का वे सेवन कर रहे हैं, वह पीएच और टीडीएस के सही मानकों पर खरा उतरता हो। यही सुरक्षित और स्वस्थ जीवन की असली कुंजी है।
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