श्रीकृष्ण की कई लीलाओं से बारे में हम सभी जानते हैं। कारावास में श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर माखन चोरी, कंस वध, रास लीला जैसी कई लीलाएं हैं, जिससे शायद की कोई अंजान होगा। लेकिन जब बात आती है कृष्ण के मृत्यु की तो यह आज भी कई लोगों के लिए रहस्य बना है।
क्या आप जानते हैं कि, कृष्ण की मृत्यु आखिर कैसे हुई? किसी ने कृष्ण को मृत्यु का श्राप दिया? क्या किसी ने कृष्ण को मार डाला? किसी ने कृष्ण को मारा या श्रीकृष्ण ने स्वयं इच्छा मृत्यु को चुना? आइए जानते हैं महाभारत युद्ध के बाद श्रीकृष्ण की मृत्यु से जुड़े प्रसंग के बारे में।
महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत की पूरी कहानी को 18 खण्डों में संकलित किया था। महाभारत का युद्ध पूरे 18 दिनों तक चला था, जिसमें पांडवों की जीत हुई। युद्ध में कौरवों के कुल का नाश हुआ और पांडवों में केवल 5 पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के भी लोग मारे गए। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाभारत युद्ध में पांडव और कौरवों के कुल के साथ ही एक और कुल का भी नाश हो गया और वह कुल था ‘श्रीकृष्ण का यदुवंश’। आइए जानते हैं महाभारत युद्ध के पश्चात की कहानी जोकि श्रीकृष्ण से जुड़ी है।
महाभारत युद्ध के बाद की कहानी
महाभारत युद्ध के बाद यदुवंश के विनाश और भगवान श्रीकृष्ण की मृत्यु से जुड़े प्रसंग आज भी लोगों को चौंकाते हैं। युद्ध समाप्त होने के बाद पांडवों के साथ श्रीकृष्ण गांधारी और धृतराष्ट के पास पहुंचे। खून से लथपथ दुर्योधन का शरीर और अंधे मां-बाप की आंखों में आंसू देखकर पांडव भी दुखी हो गए। गांधारी दुर्योधन की मृत्यु का जिम्मेदार श्रीकृष्ण को मानने लगे। उसने श्रीकृष्ण से कहा- मैंने विष्णु अवतार मानकर आपकी पूजा की। यदि आप चाहते तो अपनी दिव्य शक्तियों से इस घटना को टाल सकते थे। गांधारी ने कृष्ण को श्राप देते हुए कहा कि, यदि भगवान विष्णु के प्रति मेरी आस्था सच्ची है तो, जिस प्रकार मेरा कुल नष्ट हुआ, वैसे ही आज से ठीक 36 साल बाद तुम्हारा यादव वंश (यदुवंश) भी नष्ट हो जाएगा। आश्चर्यजनक रूप से 36 साल बाद ठीक वैसा ही हुआ।
सांब की एक शरारत बनी द्वारका के विनाश का कारण
श्रीकृष्ण अपनी द्वारका नगरी में रहने लगे और साल दर साल समय बीतता गया। एक बार ऋषि दुर्वासा, वशिष्ठ, ऋषि विश्वामित्र और नारद सभी कृष्ण से मिलने द्वारका आए हुए थे। तभी श्रीकृष्ण के पुत्र सांब को शरारत सूझी। उसने स्त्री वेश धारण कर ऋषियों से मुलाकात की और कहा कि वो गर्भवती है। उसने ऋषियों से कहा कि, वे उसे बताए कि उसके गर्भ में पल रहे शिशु का लिंग क्या है। यह देख एक ऋषि को गुस्सा आ गया और उनमें से एक ऋषि ने क्रोधित होकर सांब को श्राप दिया कि वो लोहे के तीर को जन्म देगा, जिससे उनके कुल और साम्राज्य का विनाश हो जाएगा।
सांब ने यह पूरी घटना उग्रसेन को बताई। श्राप से बचने के लिए उग्रसेन ने सांब से कहा कि, वह एक लोहे की तीर का चूर्ण बनाकर नदी में प्रवाहित कर दे। इससे वह इस श्राप से मुक्त हो जाएगा। सांबा ने ऐसा ही किया। साथ ही उग्रसेन ने आदेश दिया कि यादव राज्य में किसी प्रकार की नशीली सामग्रियों का ना तो उत्पादन किया जाएगा और ना ही वितरण।
इस घटना के बाद द्वारका में अशुभ संकेत मिलने शुरू हो गए। जैसे सुदर्शन चक्र, कृष्ण के शंख, उनके रथ और बलराम के हल का अदृश्य हो जाना। द्वारका में अपराध, पाप और अमानवीयता बढ़ने लगा। निंदा, द्वेष जैसी भावनाएं लोगों में बढ़ने लगी। ऋषि-मुनियों का अपमान होने लगा। यह सब देख कृष्ण भी दुखी हुए और उन्होंने अपनी प्रजा से प्रभास नदी के तट पर जाकर पापों का प्रायश्चित करने को कहा। लेकिन द्वारकावासी नशे में चूर होकर वहां एक दूसरे से लड़ने लगे और इस प्रकार यादव वंश के लोग आपस में लड़कर मर गए।
निश्चित थी श्रीकृष्ण की मृत्यु
इस घटना के बाद कृष्ण ने भी एक वृक्ष के नीचे योग समाधि लेने का निर्णय किया। इस दौरान जरा नामक शिकारी शिकार की तलाश में वहां आ गया। उसने दूर से श्रीकृष्ण को हिरण समझकर तीर चला दी। लेकिन जब वह पास पहुंचा तो उसे अपनी गलती का आभास हुआ और उसने कृष्ण ने क्षमा भी मांगी। तब श्रीकृष्ण ने जरा को सांत्वना दी और कहा कि उसकी मृत्यु निश्चित थी।
कृष्ण ने जरा शिकारी को बताया कि, त्रेतायुग में लोग मुझे राम रूप में जानते थे। राम ने बाली का वध भी छिपकर किया था। इस जन्म में मुझे उसी की सजा मिली है। दरअसल पूर्व जन्म में जरा ही बाली था। इतना कहकर श्रीकृष्ण ने भी अपने शरीर का त्याग कर दिया। मान्यता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु के बाद ही कलियुग की शुरुआत हुई।
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