फर्जी डिग्री वाला आरोपी गिरफ्तार, राज्य में ऐसे मामलों में 20% वृद्धि
खबर वर्ल्ड न्यूज-बालोद। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में एक झोलाछाप डॉक्टर की घोर लापरवाही ने एक 40 वर्षीय युवक की जिंदगी छीन ली। घटना ने न केवल एक परिवार को शोक में डुबो दिया है, बल्कि राज्य में अवैध चिकित्सा पद्धति के खिलाफ सवालों का पुलिंदा भी खोल दिया है। पुलिस ने जांच में आरोपी डॉक्टर की डिग्री को फर्जी पाया और उसे गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया। यह मामला 8-11 मई 2025 के बीच का है, लेकिन इसकी गिरफ्तारी 18 सितंबर को हुई, जो राज्य में झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ चल रही मुहिम का हिस्सा लगती है।
घटना का पूरा विवरण: 9 इंजेक्शन और रक्तस्राव की भयावहता
ग्राम हज्जुटोला (बालोद जिला) के निवासी आनंदराव जनबंधु (उम्र अज्ञात) ने 8 मई 2025 को अपने बेटे सुभाष कुमार जनबंधु (40 वर्ष) को बवासीर के पुराने इलाज के लिए कांदुल (बालोद) के रहने वाले डॉक्टर रेखराम साहू के पास ले गए। सुभाष पिछले 14-15 वर्षों से बवासीर से पीड़ित थे और देसी दवाओं से कोई राहत नहीं मिल रही थी।
आरोपी रेखराम साहू ने इलाज के नाम पर आनंदराव से 8,000 रुपये वसूले और सुभाष के गुदा द्वार में 9 इंजेक्शन अलग-अलग जगहों पर लगा दिए। यह प्रक्रिया पूरी तरह से गैर-पेशेवर और खतरनाक साबित हुई। अगले ही दिन, 9 मई को सुभाष को अत्यधिक रक्तस्राव शुरू हो गया, साथ ही उनका पेट फूलने लगा—ये लक्षण गंभीर इंफेक्शन और आंतरिक क्षति के संकेत थे। परिजनों ने तुरंत रेखराम को फोन किया, लेकिन उन्होंने बहाने बनाकर फोन बंद कर दिया।
डरते-डरते परिजनों ने सुभाष को दुर्ग स्थित शंकराचार्य अस्पताल, जुनवानी में भर्ती कराया। वहां के चिकित्सकों ने प्रारंभिक जांच में पाया कि इंजेक्शन गलत तरीके से लगाए गए थे, जिससे इंफेक्शन फैल गया। अत्यधिक रक्तस्राव और इंफेक्शन के कारण 11 मई 2025 को सुभाष की मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में भी यही कारण सामने आए। आनंदराव ने बताया, “हम गरीब परिवार हैं, सरकारी अस्पताल दूर था। झोलाछाप पर भरोसा किया, लेकिन बेटे की जान चली गई।”
पुलिस कार्रवाई: फर्जी डिग्री का खुलासा, 18 सितंबर को गिरफ्तारी
पीड़ित परिवार की शिकायत पर गुंडरदेही एसडीओपी ने तुरंत जांच शुरू की। जांच में पाया गया कि रेखराम साहू की डॉक्टरी डिग्री छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में रजिस्टर्ड नहीं थी—यह पूरी तरह फर्जी थी। थाना अर्जुंदा में IPC की धारा 304A (लापरवाही से मौत) और अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया।
पुलिस अधीक्षक योगेश पटेल के निर्देश पर अतिरिक्त एसपी मोनिका ठाकुर और एसडीओपी राजेश बागड़े के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी जोगेंद्र साहू की अगुवाई में विशेष टीम गठित की गई। टीम ने छापेमारी कर रेखराम को 18 सितंबर 2025 को उसके कांदुल स्थित क्लिनिक से गिरफ्तार किया। पूछताछ में उसने इलाज की लापरवाही स्वीकार की। कोर्ट ने उसे न्यायिक रिमांड पर भेज दिया। पुलिस ने क्लिनिक से फर्जी डिग्री, दवाओं के नमूने और रिकॉर्ड जब्त किए हैं।
राज्य में झोलाछाप डॉक्टरों का काला साया: आंकड़ों से साफ खतरा
यह घटना छत्तीसगढ़ में झोलाछाप डॉक्टरों की बढ़ती समस्या को उजागर करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 57.3% एलोपैथिक डॉक्टरों के पास कोई मेडिकल योग्यता नहीं है। छत्तीसगढ़ जैसे ग्रामीण-प्रधान राज्य में यह आंकड़ा और भी चिंताजनक है, जहां डॉक्टरों की कमी के कारण लोग अवैध चिकित्सकों पर निर्भर हो जाते हैं।
2025 में अब तक छत्तीसगढ़ में झोलाछाप डॉक्टरों से जुड़े कम से कम 5 प्रमुख मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें 3 मौतें दर्ज हैं:
- अप्रैल 2025: बिलासपुर के बेलगहना में एक झोलाछाप डॉक्टर की लापरवाही से 2 मासूम बच्चों की मौत; आरोपी गिरफ्तार।
- अगस्त 2025: गरियाबंद के पेंड्रा में पाइल्स इलाज के दौरान एक आदिवासी युवक की मौत; परिजनों ने 50 लाख मुआवजे की मांग की।
- मार्च 2025: गरियाबंद के देवभोग में जच्चा-बच्चा की मौत अवैध क्लिनिक में; आदिवासी समाज में उबाल।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) के अनुमान से भारत में 10 लाख झोलाछाप डॉक्टर सक्रिय हैं, और छत्तीसगढ़ में ही 20% वृद्धि 2024-25 में देखी गई है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी (NHM 2020) के अनुसार, राज्य के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में डॉक्टरों की कमी 40% है, जिससे लोग स्थानीय ‘डॉक्टरों’ पर भरोसा करते हैं। 2025 के पहले 9 महीनों में ऐसे मामलों में 15% शिकायतें बढ़ी हैं, ज्यादातर बवासीर, प्रसव और इंफेक्शन से जुड़ी।
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “झोलाछाप अक्सर कैंसर, टीबी जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज करते हैं। 2024 में रायपुर के आरंग में एक क्लिनिक से नशीली दवाएं और गर्भपात की गोलियां जब्त हुईं।” राज्य सरकार ने 2025 में झोलाछापों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया है, जिसमें 50 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं।
प्रभावित परिवार और समाज की मांग: सख्त कानून और जागरूकता
सुभाष के परिवार ने बताया, “हमने 15 साल देसी इलाज में बर्बाद किए, लेकिन यह अंतिम साबित हुआ। सरकार को क्लिनिकों की जांच अनिवार्य करनी चाहिए।” आदिवासी बहुल बालोद जिले में ऐसी घटनाएं गरीबों को सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। IMA ने मांग की है कि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को सख्ती से लागू किया जाए, ताकि फर्जी डिग्री वालों पर 7 साल तक की सजा हो सके।


