khabarworld24.com – डॉ. मनमोहन सिंह को भारतीय आर्थिक सुधार का शिल्पकार और एक महत्वपूर्ण आर्थिक नायक माना जाता है। उनके नेतृत्व में 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए जो बड़े सुधार किए गए, वे आज भी भारतीय आर्थिक विकास के एक महत्वपूर्ण चरण माने जाते हैं। यहां पर हम उनके जीवन, संघर्ष, योगदान और प्रधानमंत्री रहते हुए उनके द्वारा लिए गए प्रमुख निर्णयों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
जीवन परिचय और संघर्ष
डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर 1932 को ब्रिटिश भारत के पंजाब प्रांत में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया। मनमोहन सिंह ने अपनी शिक्षा पंजाब विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से की। उनकी शिक्षा के दौरान वह एक कुशल अर्थशास्त्री के रूप में उभरे और बाद में वह अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य करने लगे।
उनके संघर्ष का एक बड़ा हिस्सा उस समय आया जब वे वित्त मंत्री बने। उस समय देश आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर था, कर्ज बढ़ता जा रहा था और भारत की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही थी।
आर्थिक सुधारों में योगदान
मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्त मंत्री के रूप में जब कार्यभार संभाला, तब भारत को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। सरकार के पास सिर्फ कुछ हफ्तों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था, जिससे देश को भारी वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। इस समय डॉ. सिंह ने कुछ ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों को लागू किया, जो आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था के आधारस्तंभ माने जाते हैं।
- विनियोजन सुधार (Liberalization): डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलने का काम किया गया। सरकार ने कई क्षेत्रों में निजी निवेश की अनुमति दी और सरकारी नियंत्रण कम किया।
- औद्योगिक नीति में सुधार: लाइसेंस राज की समाप्ति और व्यापार की शर्तों को आसान बनाकर उन्होंने भारतीय उद्योगों के लिए नए द्वार खोले।
- वित्तीय क्षेत्र में सुधार: विदेशी निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए नीतियों में बदलाव किए गए, जिससे विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश करने का मौका मिला। उन्होंने रुपये के अवमूल्यन और विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाने के लिए बड़े सुधार किए।
- प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI): विदेशी निवेश के लिए कई क्षेत्रों को खोला गया, जिससे देश में पूंजी का प्रवाह बढ़ा और आर्थिक विकास की गति तेज हुई।
इन सुधारों के परिणामस्वरूप 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हुई और वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत हुई।
प्रधानमंत्री रहते हुए देशहित के फैसले
डॉ. मनमोहन सिंह 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उनके कार्यकाल के दौरान कई प्रमुख निर्णय लिए गए, जो भारत की आर्थिक और सामाजिक संरचना पर गहरा प्रभाव डालते हैं:
- महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA): यह योजना ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई, जिससे लाखों गरीब ग्रामीणों को रोजगार मिला।
- भारत-अमेरिका परमाणु समझौता: यह समझौता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से किया गया था, जिससे भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी प्रगति मिली।
- वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion): प्रधानमंत्री जन धन योजना और आधार जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए गए, जिससे गरीब तबके को बैंकिंग सेवाओं और सरकारी योजनाओं का लाभ मिला।
- खाद्य सुरक्षा अधिनियम: यह अधिनियम गरीबों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए लागू किया गया, जिससे देश के लाखों लोगों को लाभ मिला।
- प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT): सरकार की सब्सिडी को सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाने के लिए यह योजना लागू की गई, जिससे सरकारी धन का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हुआ।
आर्थिक मजबूती के आंकड़े
मनमोहन सिंह के आर्थिक सुधारों और उनके प्रधानमंत्री रहते हुए लिए गए फैसलों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था ने असाधारण वृद्धि दर्ज की:
- 1991-2004 के बीच आर्थिक वृद्धि दर: मनमोहन सिंह के सुधारों के परिणामस्वरूप भारत की GDP वृद्धि दर 3-4% से बढ़कर 6-8% के बीच हो गई।
- 2004-2014 के बीच आर्थिक वृद्धि दर: उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान, भारत की आर्थिक वृद्धि दर औसतन 7-8% रही, जिससे भारत को एक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में पहचान मिली।
- विदेशी मुद्रा भंडार: 1991 में जहां भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $2 बिलियन से भी कम था, वहीं 2014 तक यह $300 बिलियन से अधिक हो गया था।
- गरीबी दर: उनके कार्यकाल के दौरान गरीबी दर में कमी आई, और करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया।
निष्कर्ष
डॉ. मनमोहन सिंह का भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान अद्वितीय है। उन्होंने जिस तरीके से 1991 में आर्थिक संकट को सुधारों में बदल दिया और उसके बाद प्रधानमंत्री के रूप में देश को वैश्विक मंच पर एक शक्तिशाली आर्थिक इकाई के रूप में स्थापित किया, वह सराहनीय है। उनके द्वारा लिए गए निर्णयों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान किया और आज हम जिस आर्थिक सशक्त भारत को देखते हैं, उसमें उनका योगदान अविस्मरणीय है।
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