KWNS – व्यास पाठक, रायपुर l भारत के आंतरिक सुरक्षा इतिहास में आज, 31 मार्च का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज होने जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित समय-सीमा के अनुसार, आज देश से ‘माओवादी आतंकवाद’ के आधिकारिक अंत का दिन है। करीब पांच दशकों तक देश के एक-तिहाई हिस्से पर अपनी समानांतर ‘जनताना सरकार’ चलाने वाली खूनी विचारधारा अब अपने अस्तित्व की अंतिम सांसें गिन रही है।
दस्तावेजों और नक्सली विशेषज्ञों के अनुसार नक्सली आंध्रप्रदेश के रास्ते वर्ष 1968 में अविभाजित मध्यप्रदेश के बस्तर में पहली बार दाखिल हुए। शुरुआत में उन्होंने सिर्फ विचारधारा का प्रचार किया, लेकिन धीरे-धीरे संगठन को मजबूत करना जारी रखा। ग्रामीणों को हथियार दिए, हथियार चलाने-बनाने की ट्रेनिंग दी, बारूदी विस्फाेट की तकनीक सिखाई और जनता के बीच अपनी जनताना सरकार खड़ी कर ली। ग्रामीणों में डर पैदा करने के लिए जनताना सरकार फैसला सुनाने लगी, ऑन स्पॉट सजा दी जाने लगी। इस तरह भय और दहशत का साम्राज्य पशुपति से तिरुपति यानी नेपाल से आंध्रप्रदेश का जंगली इलाका लाल गलियारों के रूप में विख्यात हाे गया। माओवादियाें के लाल गलियाे में सुरक्षाबलों के लिए भी घुसना आसान नहीं था। इन इलाकों में देश के तकरीबन एक तिहाई जिले आते थे। इन जिलों में हथियारबंद माओवादी दस्तों की सत्ता चलती थी। माओवादी स्कूलों, रेलवे लाइनों, पुलिस थानों, डाकघरों को निशाना बनाते थे। जिसके जवाब में छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति और केंद्र सरकार के विश्वास, विकास और सुरक्षा के त्रिवेणी मॉडल कामयाबी रही। छत्तीसगढ़ सरकार अब इससे भी आगे बढ़ गई है, और पुनर्वास से पुनर्जीवन की नीति पर आगे बढ़ने एवं सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप के स्थापना के परिणाम स्वरूप माओवादी संगठन काे खात्मे की कगार मेें लाकर खड़ा कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि है कि देश में चीन के कम्यूनिस्टों से प्रभावित होकर पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से 1967 में किसानों के हिंसक आंदोलन से मोआवादी हिंसा शुरू हुई जो 2010 में चरम पर आते-आते देश के एक दर्जन से अधिक राज्यों के करीब 220 जिलों तक फैल गया। वर्ष 2024 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के निर्देश पर सभी राज्यों ने मिलकर काम किया। केंद्र-राज्य की 72000 की फौज पिछले डेढ़ साल से यही डेरा डाले रही, परिणाम स्वरूप एक-एक कर बड़े लीडर मारे जाने लगे। 21 मई 2025 यह तारीख टर्निंग प्वांइट बनीं, क्योंकि पहली बार नक्सलियों का महासचिव बसवाराजू मारा गया। इस मौत ने नक्सलियों में घबराहट पैदा कर दी और बड़ी तेजी से आत्मसमर्पण का दौर शुरू हुआ। 18 नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा नक्सली हिड़मा की मौत के बाद बस्तर में यह विश्वास हाेने लगा कि 31 मार्च को नक्सलवाद हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
पुलिस रिकार्ड के अनुसार अब तक 535 नक्सली मारे जा चुके हैं, वहीं 2898 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है, 1921 गिरफ्तार हुए, इसके साथ ही 1200 से अधिक हथियार और 1400 से ज्यादा आईईडी बरामद किए गए, जिससे नक्सली संगठन की क्षमता गंभीर रूप से कमजोर हुई, 5 दशकों से नासूर बन चुका नक्सलवाद अंतिम सांसे गिन रहा है। सभी बड़े कैडर आत्मसमर्पण कर चुके हैं, या मारे जा चुके हैं। क्या जवानों के बलिदान से हासिल हुई इतनी बड़ी सफलता नक्सलवाद पर विजय को दिन हाेगा?
माओवादी कहते रहे हैं कि सत्ता की राह बंदूक की नाल से निकलती है, बारूद से निकलती है, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने कुछ उसी अंदाज में माओवादी सत्ता की राह बंदूक और बारूद से रोका, लेकिन दूसरी तरफ पुनर्वास अभियान भी जारी रखा। वैसे यह भी सच है कि विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं, एक विचारधारा के रूप में वह माओवाद भी जिंदा रह सकता है। लेकिन अब उसके उस तरह प्रतिबद्ध अनुयायी नहीं होंगे, उनकी गोलियों की आवाज और धमक भी नहीं होगी। अगर यह विचारधारा लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़े तो शायद ही किसी को एतराज होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगर यह विचारधारा जिंदा भी बचती है तो वह लोकतांत्रिक ढंग से आगे बढ़ेगी, हथियारों के दम पर नहीं।


