खबर वर्ल्ड24-व्यास पाठक -छत्तीसगढ़ –महंगाई दर में परिवर्तन (2014-2024):
भारत में 2014 से 2024 तक महंगाई में महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव देखा गया है। इस दशक में महंगाई को प्रभावित करने वाले कई आर्थिक और वैश्विक कारक रहे हैं, जिनमें वैश्विक तेल कीमतें, कोविड-19 महामारी, और रूस-यूक्रेन युद्ध प्रमुख रूप से शामिल हैं। महंगाई की गणना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार पर की जाती है, जो सामान्य रूप से उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में वृद्धि का मापदंड है।
महंगाई दर के आंकड़े:
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2014-2016:
- महंगाई दर (CPI): लगभग 6% (2014) से घटकर 3-4% (2016) तक आई।
- कारण: 2014 के बाद से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नीतिगत ब्याज दरों में बदलाव और खाद्य आपूर्ति में सुधार ने महंगाई को नियंत्रित करने में मदद की। इस अवधि में खाद्य पदार्थों और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें नियंत्रित रहीं, जिससे महंगाई दर कम रही।
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2017-2019:
- महंगाई दर (CPI): इस अवधि में 4-6% के बीच उतार-चढ़ाव रहा।
- कारण: पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतें, मानसून की अनिश्चितता और कृषि उत्पादन में कमी के कारण खाद्य महंगाई बढ़ी। 2019 के अंत तक महंगाई दर 6% तक पहुंच गई थी, खासकर सब्जियों और दालों की कीमतों में वृद्धि के कारण।
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2020-2022:
- महंगाई दर (CPI): कोविड-19 महामारी के प्रभाव के चलते औसतन 6-7% रही।
- कारण: महामारी के कारण आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारी रुकावटें आईं, जिससे उत्पादन और वितरण प्रभावित हुआ। कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, लॉकडाउन के कारण मांग में अचानक गिरावट और राहत पैकेजों के कारण मुद्रास्फीति बढ़ी। खाद्य पदार्थों, दवाइयों और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि ने भी महंगाई दर को ऊंचा रखा।
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2023-2024:
- महंगाई दर (CPI): औसतन 6-7% के बीच रही।
- कारण: रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति को बाधित किया। इसके परिणामस्वरूप कच्चे तेल और गेहूं जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में तेजी आई। भारत, जो ऊर्जा का एक बड़ा आयातक है, इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसके अलावा, वैश्विक बाजारों में मुद्रास्फीति के बढ़ते दबाव ने भी भारत में महंगाई दर को प्रभावित किया।
महंगाई बढ़ने के प्रमुख कारण:
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वैश्विक तेल और ऊर्जा की कीमतें:
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इस दौरान वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि ने परिवहन, बिजली, और उत्पादन लागत को बढ़ा दिया, जिससे वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में इजाफा हुआ। -
कोविड-19 महामारी का प्रभाव:
महामारी के दौरान आपूर्ति शृंखला में कई बाधाएं आईं, जिसके कारण कृषि और औद्योगिक उत्पादन प्रभावित हुआ। इसके परिणामस्वरूप आवश्यक वस्तुओं, खासकर खाद्य और स्वास्थ्य सेवाओं की कीमतें बढ़ीं। -
रूस-यूक्रेन युद्ध:
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने वैश्विक खाद्य और ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता पैदा की। इससे भारत में ईंधन और खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि हुई, जिससे महंगाई पर असर पड़ा। -
सरकारी नीतियाँ और राहत पैकेज:
महामारी के समय भारत सरकार द्वारा कई राहत पैकेज दिए गए, जिससे मांग में अचानक वृद्धि हुई। हालांकि, इन नीतियों का उद्देश्य आर्थिक पुनर्जीवन था, लेकिन इससे मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन बना, जो महंगाई को बढ़ावा देने का एक कारक बना। -
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की नीतियाँ:
RBI ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में बदलाव किए। उच्च ब्याज दरों ने मांग को नियंत्रित करने में मदद की, लेकिन साथ ही इससे बाजार में कर्ज महंगा हो गया, जिससे उत्पादन लागत बढ़ी और कीमतों में इजाफा हुआ।
आगे की चुनौतियाँ और संभावनाएँ:
महंगाई दर को नियंत्रित करना 2024 में भी एक चुनौती बनी हुई है, खासकर जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ अभी तक पूरी तरह से सामान्य नहीं हुई हैं। सरकार और RBI द्वारा महंगाई पर काबू पाने के लिए उठाए गए कदम, जैसे नीतिगत दरों में बदलाव और आपूर्ति में सुधार के प्रयास, आने वाले वर्षों में स्थिति को स्थिर करने में मदद कर सकते हैं।
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