खबर वर्ल्ड न्यूज-रायपुर । भारत के छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले के धुरवा आदिवासी समाज में शादी के दौरान अग्नि की जगह पानी को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं !
• वैवाहिक परंपरा में काफी अंतर देखी जाती है। हमारे इस परंपरा में विवाह को सात जन्मों का बंधन माना जाता है। बकायदा अग्नि के समक्ष फेरे लेकर वचनों को निभाने की कसमें खाई जाती है। यह सब शहरी सभ्यता के उजाले में होता आ रहा है। लेकिन बस्तर के धुरवा आदिवासी विवाह में अग्नि के स्थान पर पानी को साक्षी मानकर वैवाहिक जीवन में बंध जाते हैं। इनमें कन्यादान की परंपरा भी नहीं निभाई जाती है। वर अपनी वधू का मांग नहीं भरता, और न ही कोई वचन देता ता है। है।
हवन पूजन भी इस दौरान नहीं किए जाते। बस शराब, बकरा और लंदा से खुश हो जाते हैं और पूरा समारोह उत्साही हो जाता है। वैवाहिक समारोह की खुशियां करीब सप्ताह भर चलते हैं। केवल जल और जंगल ही इस विवाह के सबसे बड़े साक्षी होते हैं। शादी के रस्मों को निभाने को निभाने के लिए वर और वधू घर के पास की खुली किसी जगह पर परिजनों के साथ उत्सव जैसे माहौल में इकट्ठा होते हैं। गांव का पुजारी मंत्रोपचार के साथ हंडी भर पानी से वर वधू को तरबतर कर देता है। हंडी का मुंह बांस के बने ढक्कन से ढका होता है, जिसे वर वधू के निकटतम परिजन पकड़े होते हैं। शादी से एक दिन पहले से मायके पक्ष के लोग वधू को घर लेकर आते हैं। वर पक्ष इन्हें सम्मानपूर्वक अपने साथ लेकर जाता है। वधू की बारात निकाली जाती है जिसमें केवल महिलाएं ही शामिल होती हैं। मां, मौसी और बुआ अगुवाई करती हैं। यहां के लोग कांगेर नाले के किनारे कोटमसर गांव में रहते हैं। वे नाले के पानी का भरपूर इस्तेमाल निस्तारी के लिए करते हैं। लेकिन इस पानी को पीने के लायक नहीं समझते। इनका मानना है कि नाले के पानी पीने से बीमारियां उत्पन्न होती हैं। पीने के लिए पाताल कुंआ का पानी इन्हें अच्छा लगता है। वैसे इस इलाके में आदिवासी प्यास बुझाने के लिए पानी कम और पेज ज्यादा पीते हैं।
बस्तर के धुरवा आदिवासी विवाह में अग्नि के स्थान पर पानी को साक्षी मानकर वैवाहिक जीवन में बंध जाते हैं। इनमें कन्यादान की परंपरा भी नहीं निभाई जाती है। वर अपनी वधू का मांग नहीं भरता, और न ही कोई वचन देता है। हवन पूजन भी इस दौरान नहीं किए जाते।

