Khabarworld24.com -आईटीसी लिमिटेड के चेयरमैन संजीव पुरी ने हाल ही में सप्ताह में 90 घंटे काम करने के विवाद पर अपनी राय दी, जिसमें उन्होंने कहा कि कर्मचारियों के लिए कामकाजी घंटे निर्धारित करने के बजाय उन्हें कंपनी के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ना अधिक महत्वपूर्ण है। उनका मानना है कि कर्मचारियों का नजरिया और उनके काम के प्रति दृष्टिकोण ही संगठन के लिए अधिक मूल्यवान होते हैं।
पुरी ने उदाहरण देते हुए कहा, “आप किसी राजमिस्त्री से पूछे कि वह क्या कर रहा है, तो वह कह सकता है कि वह ईंट लगा रहा है, कोई कह सकता है कि वह दीवार बना रहा है। वहीं कोई कह सकता है कि वह महल बना रहा है।” उनका कहना था कि कर्मचारियों को काम के घंटे के बजाय उनके काम के उद्देश्य से जोड़ने की आवश्यकता है।
लचीला कामकाजी माहौल
पुरी ने इस मुद्दे पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि आईटीसी एक लचीले कामकाजी माहौल को बढ़ावा देती है, जिसमें सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की सुविधा भी शामिल है। उनका मानना है कि इस प्रकार का माहौल कर्मचारियों को न केवल आराम देता है, बल्कि उनका मनोबल भी बढ़ाता है।
“हम यह मानते हैं कि लोग कार्य को यात्रा का हिस्सा मानें और जोश से इसमें शामिल हों, ताकि वे बदलाव लाने की इच्छा रखें। यही हमारी कंपनी की दृष्टि है,” पुरी ने कहा। उनके अनुसार, कंपनी कर्मचारियों को उनकी पूरी क्षमता के अनुसार काम करने और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने पर जोर देती है।
कार्य जीवन संतुलन पर बहस
पुरी के इस बयान के बाद, कार्य जीवन संतुलन पर बहस छिड़ गई है। एलएंडटी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एस.एन. सुब्रह्मण्यन के विवादास्पद बयान ने इस चर्चा को और बढ़ावा दिया। सुब्रह्मण्यन ने हाल ही में कहा था, “मुझे खेद है कि मैं आप लोगों से रविवार को काम नहीं करा सकता। आप घर बैठकर क्या करेंगे? आप अपनी पत्नी को कितनी देर तक निहार सकते हैं और आपकी पत्नी कितनी देर तक आपको देख सकती है?”
सुब्रह्मण्यन के इस बयान ने निजी जिंदगी और काम के बीच संतुलन को लेकर सवाल उठाए, जिसे व्यापारिक समुदाय के कुछ प्रमुख सदस्य आलोचना कर रहे हैं। आरपीजी समूह के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने कहा कि लंबे समय तक काम करना सफलता नहीं बल्कि थकान का कारण बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि कार्य जीवन संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि कर्मचारियों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य भी बना रहे।
90 घंटे काम का विवाद
कर्मचारियों के काम के घंटे पर यह विवाद तब सामने आया जब कुछ व्यवसायियों ने यह सुझाव दिया था कि सप्ताह में 90 घंटे काम करने से कंपनियों की उत्पादकता में वृद्धि हो सकती है। हालांकि, संजीव पुरी ने इस विचार का विरोध किया और कर्मचारियों के सशक्तीकरण की आवश्यकता को रेखांकित किया। उनका मानना है कि कर्मचारियों का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनका काम।
निष्कर्ष
संजीव पुरी का कहना है कि कामकाजी घंटों से अधिक महत्वपूर्ण कर्मचारियों की क्षमता को पहचानना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। वहीं, उनके इस बयान ने काम और जीवन के बीच संतुलन को लेकर हो रही बहस को और गहरा कर दिया है। निजी कंपनियों के लिए यह समय है जब उन्हें अपने कर्मचारियों के कामकाजी माहौल को और अधिक लचीला और संतुलित बनाने पर ध्यान देना चाहिए, ताकि वे लंबे समय तक उत्पादक बने रहें और अपनी पूरी क्षमता का उपयोग कर सकें।
बालकृष्ण साहू – सोर्स विभिन्न आर्टिकल्स

