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    Home » डॉक्टरों की कमी का ‘नैरेटिव’ बनाम ठप पड़ी भर्तियां: वेंटिलेटर पर छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था
    रायपुर

    डॉक्टरों की कमी का ‘नैरेटिव’ बनाम ठप पड़ी भर्तियां: वेंटिलेटर पर छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था

    Khabar WorldBy Khabar WorldJune 22, 2026No Comments30 Views
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    छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में 17 हजार से अधिक डॉक्टर पंजीकृत, फिर भी नियमित भर्ती ठप

    राज्य में साल 2020 के बाद सीजीपीएससी (CGPSC) से नहीं हुई डॉक्टरों की नियुक्ति

    खबर वर्ल्ड न्यूज-रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों व शैक्षणिक स्टाफ की भारी कमी ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। हाल ही में सामने आए आंकड़े न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि सरकारी दावों की पोल खोलने के लिए काफी हैं। ये आंकड़े साफ बयां करते हैं कि करोड़ों मरीजों का बोझ उठाने वाले प्रदेश के मुख्य चिकित्सा संस्थान खुद स्टाफ की किल्लत से बुरी तरह हांफ रहे हैं। विडंबना यह है कि एक तरफ सरकारें ‘डॉक्टरों की कमी’ का रोना रोती हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्य में हजारों योग्य डॉक्टर होने के बावजूद सालों से नियमित भर्ती प्रक्रिया ठप पड़ी है।
    चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले संस्थानों में स्वीकृत पदों के मुकाबले आधे से अधिक पद खाली पड़े हैं। इस प्रशासनिक उदासीनता का सीधा असर मरीजों के इलाज पर तो पड़ ही रहा है, साथ ही सूबे के भावी डॉक्टरों (मेडिकल छात्रों) की पढ़ाई और भविष्य भी भगवान भरोसे चल रहा है। आलम ये है कि प्रदेश से हर साल लगभग 2250 एमबीबीएस निकल रहे हैं। इसके एवज में पीजी में बमुश्किल 399 ही सीट हैं। इसके अलावा अन्य विशेषज्ञों की तो सीट भी नहीं है। रायपुर-बिलासपुर को छोड़ दें तो राज्य के अन्य कालेजों में 80 प्रतिशत डाक्टरों के पद खाली हैं। *एमबीबीएस के बाद इंटर्नशिप करने वाले डाक्टारों को महज 530₹ प्रतिदिन रुपये मानदेय मिलता है। जबकि अन्य राज्यों में स्थिति बेहतर है। बांड की शर्तों के अनुरूप काम करने वाले डाक्टरों को भी केवल 49 हजार ही मानदेय मिलता है। दो साल तक उन्हें गांव में सेवा देनी पड़ती है। यही वजह है कि ज्यादातर युवा डाक्टर स्वेच्छा से बांड शर्तों से मुक्त होकर 25 लाख रुपये जमा करके प्रदेश से ही मुक्ति पाने की कोशिश में लगे रहते हैं।
    चिकित्सा व्यवस्था की दुर्दशा इसी से समझ सकते हैं कि प्रदेश में आज तक प्रदेश के सरकारी क्षेत्र में एक भी किडनी, लीवर या हार्ट ट्रांसप्लांट सर्जरी नहीं हो सकी है। उच्च चिकित्सा के लिए राज्य के बाहर जाने की स्थिति बनी हुई है।
    रिक्त पदों का गणित: रीढ़ विहीन ढांचा
    सरकारी आंकड़ों का बारीकी से विश्लेषण करें, तो इस बदहाली का सबसे स्याह और डरावना चेहरा सीनियर रेजिडेंट्स (SR) के पदों पर देखने को मिलता है। किसी भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल के भीतर व्यावहारिक चिकित्सा और चौबीस घंटे मुस्तैद रहने वाली व्यवस्था की रीढ़ सीनियर रेजिडेंट्स ही होते हैं। राज्य में इनके कुल 518 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 375 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 72.3 प्रतिशत पदों पर डॉक्टरों की तैनाती ही नहीं हुई है। यही वजह है कि ओपीडी से लेकर इमरजेंसी वार्डों तक में मरीजों को इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है और गिने-चुने डॉक्टरों पर काम का मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है
    पद का नाम रिक्तता (प्रतिशत में) स्थिति का आकलन
    सीनियर रेजिडेंट 72.3% सर्वाधिक गंभीर
    असिस्टेंट प्रोफेसर 51.6% चिंताजनक (आधे से अधिक खाली)
    एसोसिएट प्रोफेसर 49.1% गंभीर संकट
    प्रोफेसर 48.5% शैक्षणिक ढांचा प्रभावित
    जूनियर रेजिडेंट 41.6% जमीनी स्तर पर स्टाफ की कमी
    चिंता की बात यह भी है कि मेडिकल कॉलेजों में सिर्फ जूनियर डॉक्टरों की ही कमी नहीं है, बल्कि देश के भविष्य (डॉक्टरों) को तैयार करने वाले प्रोफेसरों की कुर्सियां भी सूनी हैं। चिकित्सा शिक्षकों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर तीनों श्रेणियों में लगभग 50 प्रतिशत पद खाली हैं। जानकारों का स्पष्ट कहना है कि अगर समय रहते इन पदों को नियमित भर्ती के जरिए नहीं भरा गया, तो चिकित्सा सेवाओं का पूरी तरह चरमराना तय है।
    चिकित्सा विशेषज्ञ के 80 प्रतिशत तक पद खाली
    चिकित्सा विशेषज्ञ: प्रदेश में कुल स्वीकृत 1773 पदों में से केवल 355 कार्यरत हैं (नियमित: 320, तदर्थ: 2, संविदा: 33)। इसके चलते रिकार्ड 1418 पद खाली हैं, यानी लगभग 80% पद रिक्त हैं। चिंताजनक बात यह है कि मोहला-मानपुर और सुकमा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में विशेषज्ञों की संख्या शून्य है, जिससे ग्रामीण अंचलों में गंभीर स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
    चिकित्सा अधिकारी : इसी तरह चिकित्सा अधिकारियों के कुल 2296 स्वीकृत पद हैं, जिनमें से 1174 पदों पर डॉक्टर कार्यरत हैं और 305 पद रिक्त पड़े हैं। हालांकि, कार्यरत अमले में नियमित डॉक्टरों की संख्या (सिर्फ 37) बेहद कम है, जबकि तदर्थ (780) और संविदा (1991) कर्मियों की संख्या कहीं अधिक है। यह स्वास्थ्य ढांचे की संविदा और तदर्थ व्यवस्था पर अत्यधिक निर्भरता को दर्शाता है।
    विरोधाभास: 17 हजार से अधिक डॉक्टर उपलब्ध, फिर भी नियुक्तियां बंद
    स्वास्थ्य सेवाओं की इस दुर्दशा के पीछे डॉक्टरों की अनुपलब्धता नहीं, बल्कि सरकारी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी है। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में पंजीकृत डॉक्टरों के ताजा आंकड़े इस विरोधाभास को पूरी तरह स्पष्ट करते हैं। राज्य में वर्तमान में कुल 17,142 डॉक्टर पंजीकृत हैं, जो चिकित्सा ढांचे को मजबूत बनाने के लिए पर्याप्त हैं। काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार:
    एमबीबीएस डॉक्टर: 11,132
    एमडी (विशेषज्ञ): 2,850
    एमएस (सर्जन): 2,740
    सुपर स्पेशलिस्ट (DM): 190
    सुपर स्पेशलिस्ट (MCh): 230
    इन नियमित डॉक्टरों के अलावा, राज्य में करीब 5,000 अस्थायी डॉक्टर भी पंजीकृत हैं, जो समय-समय पर संविदा या अन्य माध्यमों से चिकित्सा कार्यों में महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। इतने बड़े पूल के बावजूद राज्य में साल 2020 के बाद से छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के माध्यम से कोई नियमित भर्ती प्रक्रिया आयोजित नहीं की गई है। योग्य डॉक्टरों की फौज सड़क पर है या निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रही है, और सरकारी अस्पताल खाली पड़े हैं।
    जमीनी हकीकत: दो बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेजों का हाल
    केस 01: कांकेर मेडिकल कॉलेज – बिखरा हुआ बुनियादी ढांचा
    कांकेर का सरकारी मेडिकल कॉलेज इस समय घोर अव्यवस्थाओं की मार झेल रहा है। इस कॉलेज का संचालन एक एकीकृत परिसर के बजाय 5 से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित तीन अलग-अलग इमारतों (नंदनगर मॉडल कॉलेज, अलबेलापारा मातृ-शिशु अस्पताल और गोविंदपुर कोमलदेव अस्पताल) में बिखरकर हो रहा है। इस भौगोलिक दूरी के कारण छात्रों और गंभीर मरीजों को रोजाना भटकना पड़ता है। संकट केवल बुनियादी ढांचे का नहीं, बल्कि फैकल्टी का भी है। कॉलेज में ईएनटी (ENT), डर्मेटोलॉजी (त्वचा रोग) और बायोकेमिस्ट्री जैसे महत्वपूर्ण विभागों में एक भी फैकल्टी मौजूद नहीं है। इसके अलावा, छात्रों के लिए हॉस्टल की कोई सुविधा नहीं है, जिससे उन्हें बाहर महंगे कमरों में रहने को मजबूर होना पड़ रहा है।
    केस 02: राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज – ‘शून्य’ विभागाध्यक्ष और प्रोफेसर
    शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय राजनांदगांव इस समय गंभीर स्टाफ संकट के दौर से गुजर रहा है। कॉलेज में फिजियोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और रेडियोलॉजी विभागों में कोई विभागाध्यक्ष (HOD) ही नहीं है। इतना ही नहीं, फिजियोलॉजी, डर्मेटोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री और रेडियोलॉजी में एक भी प्रोफेसर तैनात नहीं है। पूरा रेडियोलॉजी विभाग केवल एक अस्थायी रेडियोलॉजिस्ट के भरोसे घिसट रहा है। अस्पताल की स्थिति भी नाजुक है; स्त्री रोग (गायनी) विभाग सिर्फ एक प्रोफेसर और सर्जरी विभाग महज दो सर्जनों के सहारे टिका है। वहीं, पोस्टमार्टम और कानूनी मामलों के लिए जिम्मेदार फोरेंसिक मेडिसिन विभाग में केवल दो लोग कार्यरत हैं।
    निजी क्षेत्र के भरोसे जनता, सरकार का शेयर आधा भी नहीं
    राष्ट्रीय मानकों के अनुसार सरकारी सेक्टर में हेल्थकेयर की हिस्सेदारी कम से कम 33 प्रतिशत तक होनी चाहिए, ताकि गरीब और मध्यम वर्ग को सस्ता इलाज मिल सके। परंतु छत्तीसगढ़ में यह आंकड़ा 15% भी नहीं हो पा रहा है। आज राज्य का 85 प्रतिशत हेल्थकेयर निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) के दम पर चल रहा है।
    जब तक सरकार स्वास्थ्य बजट को बढ़ाने और लोक सेवा आयोग के माध्यम से नियमित एवं पारदर्शी भर्ती प्रक्रियाओं को तत्काल शुरू नहीं करती, तब तक छत्तीसगढ़ की गरीब जनता को मुफ्त और विश्वस्तरीय स्वास्थ्य लाभ देने का दावा केवल कागजी ही रहेगा। डॉक्टरों की फौज तैयार है, आवश्यकता सिर्फ उन्हें व्यवस्था में शामिल करने की है।
    छत्तीसगढ़ की चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा में सुधार हेतु प्रस्ताव
    वर्तमान नीति की विसंगतियाँ:
    तर्कहीन बॉण्ड नीति: राज्य की वर्तमान नीति अत्यंत अव्यावहारिक है, जिसके अंतर्गत एम.बी.बी.एस. के विद्यार्थियों के लिए दो वर्ष की अनिवार्य ग्रामीण सेवा अथवा 25,00,000/- पच्चीस लाख रुपये के भुगतान का नियम है। वहीं दूसरी ओर, एम.डी./एम.एस. (स्नातकोत्तर) चिकित्सकों के लिए दो वर्ष की ग्रामीण सेवा या 50,00,000/- पचास लाख रुपये के अर्थदंड का प्रावधान है।
    रैंकिंग में गिरावट: इस दमनकारी नीति ने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ की चिकित्सा शिक्षा की साख और रैंकिंग को बहुत बुरी तरह नीचे गिरा दिया है। इसके विपरीत, पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में केवल एक वर्ष की अनुबंध सेवा है अथवा विकल्प के रूप में क्रमशः पाँच लाख और दस लाख रुपये का मुआवज़ा (अर्थदंड) निर्धारित है।
    राष्ट्रीय स्तर पर दुर्दशा: इस कठोर नीति के प्रतिकूल प्रभाव के कारण ही आज देश के शीर्ष दो सौ चिकित्सा महाविद्यालयों की सूची में छत्तीसगढ़ का एक भी महाविद्यालय स्थान नहीं बना पाया है।
    अतः छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी के छत्तीसगढ़ शासन को निम्नलिखित सुधारात्मक सुझाव एवं प्रस्ताव:
    1. छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) के माध्यम से डॉक्टरों, चिकित्सा विशेषज्ञों और चिकित्सा शिक्षकों के समस्त रिक्त पदों पर तत्काल पारदर्शी नियमित भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाए।
    2. अनिवार्य सीनियर रेजिडेंट (एस.आर.) पदस्थापना: एम.डी./एम.एस. परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी स्नातकोत्तर चिकित्सकों को चिकित्सा महाविद्यालयों में अनिवार्य रूप से सीनियर रेजिडेंट नियुक्त किया जाए। इससे महाविद्यालयों में विशेषज्ञ शिक्षकों की कमी दूर होगी, चिकित्सकों के व्यावहारिक (क्लीनिकल) कौशल में सुधार होगा और वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एन.एम.सी.) के शैक्षणिक मानकों को पूरा कर सकेंगे।
    3. अनुबंध सेवा पर बोनस अंक: ग्रामीण या दुर्गम क्षेत्रों में अनिवार्य अनुबंध सेवा पूर्ण करने वाले चिकित्सकों को छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सी.जी.पी.एस.सी.) की नियमित नियुक्तियों (जैसे—चिकित्सा अधिकारी या सहायक प्राध्यापक) में अतिरिक्त बोनस अंक दिए जाएँ। इससे चिकित्सकों को ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने का प्रोत्साहन मिलेगा और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था सुदृढ़ होगी।
    4. इंटर्न डॉक्टरों के मानदेय 40000/- और बांडेड डॉक्टरों के मानदेय को कम से कम 1,00,000/- जैसे अन्य प्रगतिशील राज्यों के समान सम्मानजनक बनाया जाए ताकि प्रतिभा पलायन को रोका जा सके।
    5: अगले 12 महीने में काम से कम दो मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटलों में किडनी और लिवर ट्रांसप्लांट हो सके उसके लिये त्वरित कार्यवाही करते हुए SOP बने तथा उसका जल्द से जल्द क्रियानव्यन हो ।
    6. कांकेर, राजनांदगांव महासमुंद एवं कोरबा सहित अन्य दूरस्थ मेडिकल कॉलेजों की ढांचागत एवं फैकल्टी संबंधी विसंगतियों को युद्धस्तर पर दूर किया जाए।
    7. मेडिकल कॉलेज रायपुर में हॉस्टल की वैकल्पिक व्यवस्था हेतु संगवारी भवन को बच्चों का हॉस्टल बनाने हेतु कार्यवाही की जाये।
    8. स्वास्थ्य बजट के आवंटन को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बढ़ाया जाए ताकि सरकारी चिकित्सालयों में सुपर-स्पेशलिटी सेवाएं (लीवर, किडनी एवं हार्ट ट्रांसप्लांट, सर्जरी आदि) प्रारंभ हो सकें।
    भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य) में यह स्पष्ट स्थापित किया है कि “स्वास्थ्य का अधिकार” और “सुलभ चिकित्सा प्राप्त करने का अधिकार” जीवन के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है।
    इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 47 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) के तहत लोक स्वास्थ्य का सुधार करना और नागरिकों को पोषण व जीवन स्तर प्रदान करना राज्य का प्राथमिक संवैधानिक कर्तव्य है। वर्तमान में योग्य डॉक्टरों की उपलब्धता के बावजूद नियमित भर्तियों पर लगी अघोषित रोक नागरिकों के इस बुनियादी मौलिक अधिकार का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।

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