साल की प्रमुख एकादशियों में देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व है। इसे हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं। इसके बाद चातुर्मास शुरू हो जाते हैं और विष्णु जी पाताल लोक में योगनिद्रा में चले जाते हैं। देवशयनी एकादशी 25 जुलाई 2026 को है।
कब शुरू होगी देवशयनी एकादशी तिथि
पंचांग की गणना अनुसार आषाढ़ माह की एकादशी तिथि 24 जुलाई को सुबह 9 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो रही है। 25 जुलाई को सुबह 11 बजकर 34 मिनट तक एकादशी तिथि रहेगी। 11 जून 2026 को उदयातिथि में एकादशी तिथि पड़ने के कारण गुरुवार को ही व्रत रखा जाएगा। ज्योतिषाचार्य संजीत कुमार मिश्रा के अनुसार 25 जुलाई 2026 को उदयातिथि में एकादशी होने से व्रत शनिवार को रखा जाएगा।
देवशयनी एकादशी तिथि शुरू होने के बाद न करें ये काम
एकादशी का व्रत केवल उपवास तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह संयम, सात्विकता और भगवान विष्णु की भक्ति का पर्व है, इसलिए आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि लगते ही कुछ कार्यों से परहेज करें।अगर इन नियमों का पालन नहीं किया जाए तो व्रत का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।
देवशयनी एकादशी व्रत भले ही 25 जुलाई को रखा जाएगा लेकिन 24 जुलाई से ही व्रत के नियमों का पालन करें। जानते हैं कि एकादशी शुरू होते ही किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
दशमी तिथि के दिन से ही सात्विक और हल्का भोजन करना चाहिए और तामसिक आहार, मसालेदार भोजन से दूरी बनानी चाहिए, ताकि एकादशी तिथि के समय पेट में अन्न न रहे।
व्रती को एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। देर तक सोना या आलस्य करना इस दिन उचित नहीं माना गया है।
एकादशी तिथि के शुरू होने से लेकर व्रत पारण तक ब्रह्मचर्य का पालन विशेष रूप से करें। मन, वचन और कर्म से संयम रखें। नकारात्मक विचार मन में न लाएं।
एकादशी के दिन केवल भोजन का ही नहीं, बल्कि व्यवहार का भी संयम जरूरी है। क्रोध करना, कटु वचन बोलना, झूठ कहना या किसी का अपमान करना व्रत के पुण्य को कम करता है।
एकादशी तिथि की शुरुआत से समाप्त तक घर में चावल न बनाएं। एकादशी तिथि जब विद्यमान हो तो चावल नहीं खाना चाहिए। भले ही व्रत इससे दोष लगता है।
देवशयनी एकादशी पूजा मुहूर्त – सुबह 7.21 – सुबह 9.03
व्रत पारण समय – 26 जुलाई 2026 को सुबह 05:39 से सुबह 08:22 के बीच किया जाएगा
देवशयनी एकादशी पर विष्णु जी को कैसे सुलाएं
एकादशी व्रत वाले दिन विष्णु जी की विधिवत पूजा करें। फिर इस मंत्र को बोले ये श्रीहरि को शयनकाल में जाने से पहले का प्रार्थना मंत्र।
सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत् सर्वं चराचरम्॥
अर्थ – हे जगन्नाथ! आपके शयन करने पर समस्त चराचर जगत भी विश्राम की अवस्था में आ जाता है और आपके जागने पर पुनः संपूर्ण सृष्टि जागृत होकर अपने कार्यों में प्रवृत्त होती है। आप योगनिद्रा में विराजमान होकर संसार का कल्याण करें।
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