• छत्तीसगढ़ में 15 वर्षों की सेवा के बाद 67 इंजीनियरों की सेवा समाप्त।
• भविष्य को लेकर अनिश्चितता एवं संकट की स्थिति निर्मित।
KWNS – व्यास पाठक, रायपुर l छत्तीसगढ़ में वर्षों पुरानी सब-इंजीनियर भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक बड़ा मामला सामने आया है जिसमें लगभग 15 वर्षों से सेवा दे रहे 67 इंजीनियरों की सेवा समाप्त कर दी गई है। इससे प्रभावित इंजीनियर सरकार से यह सवाल पूछ रहे हैं कि यदि नियुक्ति प्रक्रिया में कोई त्रुटि थी तो उसका दोष कर्मचारियों पर कैसे थोपा जा सकता है और अब उनके रोजगार का भविष्य क्या होगा। आज सभी की दूसरी शासकीय नौकरी में आवेदन की उम्र भी निकल चुकी है। ऐसी स्थिति में इन सभी इंजीनियरों एवं उनके परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा संबंधित तकनीकी विभागों में वर्ष 2011-12 में सब-इंजीनियर के पदों पर भर्ती हेतु विज्ञापन निकाला गया था। विज्ञापन में 275 पदों का उल्लेख था जिसे विभाग द्वारा अपने ही आदेश क्रमांक 1884 दिनांक 29.02.2012 के द्वारा बढ़ाकर 526 कर दिया गया।
इसी प्रकार शैक्षणिक अर्हता हेतु नियुक्ति के समय समस्त प्रमाण-पत्रों की उपलब्धता की शर्त रखी गई थी। जबकि 2013 में विभाग के एक और सब-इंजीनियर भर्ती के विज्ञापन में शैक्षणिक अर्हता हेतु आवेदन की तिथि को मान्य माना गया था।
शासन द्वारा 2011-12 की भर्ती प्रक्रिया में स्वयं अपने ही आदेश दिनांक 17.11.2011 के द्वारा बी.ई., बी.टेक/डिप्लोमा इन सिविल के अंतिम सेमेस्टर/वर्ष की परीक्षा में सम्मिलित अभ्यर्थियों के नामों पर विचार करने की अनुमति प्रदान की गई थी। यही नहीं, विभाग द्वारा इन अभ्यर्थियों के दस्तावेज सत्यापन तथा पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही विधिवत नियुक्ति प्रदान की गई थी। नियुक्ति के बाद से वे सभी अभियंता निरंतर 15 वर्षों से अपनी सेवाएँ विभाग को दे रहे हैं। यहाँ यह तथ्य स्पष्ट है कि पूरी भर्ती प्रक्रिया का निर्धारण विभाग द्वारा ही किया गया था।
परंतु न्यायालय में विभाग ने न तो अपना पक्ष ही ठीक से रखा और न ही न्यायालय को यह बताने में समर्थ रहे कि कट-ऑफ तिथि का निर्धारण नियुक्ति दिनांक को था। पदों की संख्या में परिवर्तन के कारण चयन प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठे, लेकिन विभाग कोई समाधानात्मक तर्क प्रस्तुत करने में विफल रहा है।
कई इंजीनियरों ने नियुक्ति के बाद अन्य भर्ती परीक्षाओं में सम्मिलित होकर नियुक्त भी होना चाहा था पर विभाग से एनओसी ही नहीं मिली।
15 वर्षों के बाद अचानक उनकी नियुक्ति को निरस्त करने के कारण इंजीनियरों के समक्ष बेरोजगारी का संकट आ गया है। प्रभावित इंजीनियरों का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में कोई प्रशासनिक त्रुटि हुई थी तो उसके लिये विभाग, चयन समिति एवं नियुक्ति अधिकारी जिम्मेदार होने चाहिए, न कि अभ्यर्थी।
आज इन इंजीनियरों के ऊपर अपने परिवारों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी है और वे शासकीय नौकरी हेतु आवेदन की उच्चतम आयुसीमा पर हैं, अतः अब उनके पास नौकरी का कोई अन्य विकल्प नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों के मामलों में मानवीय समाधान और मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता होती है, ताकि न्यायिक आदेशों के पालन के साथ ही कर्मचारियों का भविष्य भी सुरक्षित हो सके।
एक तरफ जहाँ प्रभावित इंजीनियरों ने मुख्यमंत्री, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री, मुख्य सचिव और विभागीय सचिव को पत्र लिखकर न्याय की मांग की है, वहीं दूसरी ओर यह देखना बाकी है कि क्या शासन प्रभावितों को उचित न्याय दिलाएगा या सिर्फ अपना पल्ला झाड़ लेगा।





