जल संकट को चुनौती, मिट्टी को नया जीवन: प्रगतिशील किसान की कामयाबी बनी मिसाल
खबर वर्ल्ड न्यूज-आशीष कंठले-बेमेतरा। ग्राम जेवरा, जिला बेमेतरा के प्रगतिशील कृषक दिलीप सिन्हा ने परंपरागत ग्रीष्मकालीन धान की खेती के स्थान पर दलहन-तिलहन फसलों को अपनाकर कृषि क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनकी दूरदर्शी सोच, वैज्ञानिक पद्धतियों का प्रयोग और बाजार की सही समझ के परिणामस्वरूप उन्हें लगभग 25 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ। क्षेत्र में लंबे समय से ग्रीष्मकालीन धान की खेती प्रचलित थी, जिसमें अधिक पानी, बिजली, उर्वरक और श्रम की आवश्यकता होती है। बढ़ती लागत और घटते लाभ को देखते हुए सिन्हा ने खेती के स्वरूप में बदलाव करने का निर्णय लिया।
नवाचार और निर्णय
कृषि विभाग एवं कृषि वैज्ञानिकों की सलाह से उन्होंने ग्रीष्म ऋतु में धान के स्थान पर मूंग, उड़द (दलहन) तथा सरसों, तिल (तिलहन) जैसी कम पानी और कम लागत वाली फसलों को अपनाया। इन फसलों की विशेषता यह रही कि कम सिंचाई में अच्छी पैदावार, मिट्टी की उर्वरता में सुधार (विशेषकर दलहन), बाजार में अच्छा मूल्य, रोग एवं कीट प्रकोप अपेक्षाकृत कम
वैज्ञानिक खेती के उपाय
उन्नत किस्मों का चयन, बीज उपचार एवं संतुलित उर्वरक प्रबंधन, ड्रिप/स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीक, समय पर निराई-गुड़ाई और फसल सुरक्षा, उत्पादन के बाद उचित भंडारण व विपणन इन सभी प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया। जहां पहले ग्रीष्मकालीन धान से सीमित लाभ होता था, वहीं दलहन-तिलहन फसलों से लागत घटने और उत्पादन बढ़ने के कारण कुल मिलाकर लगभग 25 लाख रुपये का शुद्ध लाभ प्राप्त हुआ।
प्रेरणा और संदेश
दिलीप सिन्हा की यह सफलता कहानी क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणास्रोत है। यह सिद्ध करती है कि यदि किसान परंपरागत खेती से हटकर फसल विविधीकरण, वैज्ञानिक तकनीक और बाजारोन्मुखी सोच अपनाएं, तो कम संसाधनों में भी अधिक लाभ अर्जित किया जा सकता है। धान के विकल्प के रूप में दलहन-तिलहन की खेती न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि जल संरक्षण, मिट्टी सुधार और टिकाऊ कृषि की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।


