सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ईडी को मिली 4 हफ्ते की कस्टडी; हजारों करोड़ के स्कैम में नया मोड़
खबर वर्ल्ड न्यूज-रायपुर। छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित नान घोटाले में पूर्व आईएएस अधिकारी आलोक शुक्ला ने शुक्रवार को रायपुर की ईडी स्पेशल कोर्ट में सरेंडर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद यह घटनाक्रम सामने आया है, जिसमें उनकी और पूर्व आईएएस अनिल तुटेजा की अग्रिम जमानत रद्द कर दी गई। कोर्ट ने ईडी को दोनों अधिकारियों की 4 हफ्ते की कस्टडी सौंप दी है, जिससे दशक पुराने इस महाघोटाले की जांच में तेजी आने की उम्मीद है। आलोक शुक्ला, जो घोटाले के दौरान राज्य के प्रमुख सचिव रह चुके हैं, अब जेल जाने के कगार पर हैं।
यह मामला 2015 में उजागर हुए नान घोटाले से जुड़ा है, जो छत्तीसगढ़ के सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का सबसे बड़ा घोटाला माना जाता है। नान एग्रो फूड्स लिमिटेड (एनएएन) द्वारा घटिया चावल और नमक की खरीद-बिक्री में कथित अनियमितताओं से राज्य को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की छापेमारी में 25 स्थानों पर की गई कार्रवाई से 3 करोड़ रुपये से अधिक की नकदी जब्त हुई थी। कुल घोटाले की अनुमानित राशि 2,000 करोड़ रुपये से अधिक बताई जाती है, जिसमें सब-स्टैंडर्ड सामग्री की आपूर्ति और दस्तावेजों में हेराफेरी शामिल है।
घोटाले का बैकग्राउंड: आंकड़ों में उजागर धांधली
नान घोटाला फरवरी 2015 में तब सामने आया जब एसीबी ने एनएएन के दफ्तरों पर छापा मारा। जांच में पाया गया कि कंपनी ने पीडीएस के तहत वितरित होने वाले चावल और नमक की गुणवत्ता मानकों का पालन नहीं किया। खाद्य नमूनों की जांच में भी असफलता साबित हुई। इस घोटाले में कुल 18 आरोपी बनाए गए, जिनमें पूर्व आईएएस अधिकारी आलोक शुक्ला और अनिल तुटेजा प्रमुख हैं। ईडी की चार्जशीट के अनुसार:
- आलोक शुक्ला को मई 2014 से फरवरी 2015 के बीच 2.21 करोड़ रुपये की रिश्वत प्राप्त हुई।
- अनिल तुटेजा को इसी अवधि में 1.51 करोड़ रुपये मिले।
- कुल जब्ती: नकदी के अलावा दस्तावेज और सबूत जो घोटाले की साजिश को उजागर करते हैं।
घोटाले का असर लाखों गरीब परिवारों पर पड़ा, जिन्हें सब्सिडी वाले अनाज के नाम पर घटिया सामग्री मिली। एसीबी/ईओडब्ल्यू की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार को 2014-15 में ही 500 करोड़ रुपये से अधिक का सीधा नुकसान हुआ, जबकि कुल प्रभावित राशि हजारों करोड़ों में है। इस स्कैम को छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह सरकार से जोड़ा जाता रहा, हालांकि कांग्रेस ने भी इसे राजनीतिक हथियार बनाया।
आलोक शुक्ला की भूमिका: जांच में बाधा और जमानत का खेल
आलोक शुक्ला, 1989 बैच के आईएएस अधिकारी, छत्तीसगढ़ के प्रमुख सचिव रह चुके हैं। रिटायरमेंट के बाद भी वे घोटाले की जांच में आरोपी बने रहे। आरोप है कि घोटाला उजागर होने के बाद उन्होंने एसीबी अधिकारियों पर दबाव डाला, दस्तावेज तोड़े-मरोड़े और जांच को प्रभावित किया। इससे उन्हें अग्रिम जमानत मिल गई थी। लेकिन ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग के तहत जांच शुरू की, तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
18 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने शुक्ला और तुटेजा की अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा कि सरेंडर के बिना जमानत पर विचार नहीं होगा। कोर्ट ने शुक्ला को एक हफ्ते का समय दिया। इसके बाद शुक्ला दो दिनों में दो बार रायपुर कोर्ट पहुंचे, लेकिन ईडी ने पहले हिरासत लेने से इनकार कर दिया। ईडी के वकील सौरभ पांडे ने मीडिया को बताया कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं, लेकिन प्रक्रिया पूरी करनी होगी। अब सोमवार (22 सितंबर) को ईडी की दिल्ली टीम रायपुर पहुंचेगी, और कस्टडी को अंतिम रूप दिया जाएगा।
नया मोड़: सीबीआई की एंट्री और राजनीतिक उथल-पुथल
अप्रैल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की याचिका पर सवाल उठाए थे, जब एजेंसी ने केस ट्रांसफर की कोशिश की। इसी बीच, अप्रैल 2025 में सीबीआई ने पूर्व नौकरशाहों और पूर्व एडवोकेट जनरल के खिलाफ जांच संभाली, जो नान स्कैम प्रोब में हस्तक्षेप के आरोपी हैं। नवंबर 2024 में एसीबी ने दो पूर्व आईएएस और पूर्व एजी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की, जिसमें गवाहों को प्रभावित करने के आरोप हैं।
यह घोटाला अब राजनीतिक रंग ले चुका है। पूर्व सीएम भूपेश बघेल पर भी आरोप लगे कि उन्होंने तुटेजा को बचाने की कोशिश की। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं, खासकर 2,000 करोड़ के लिकर स्कैम से जुड़े लिंक्स के कारण। विशेषज्ञों का मानना है कि ईडी की 4 हफ्ते कस्टडी में नए तथ्य सामने आ सकते हैं, जो पूरे नान नेटवर्क को उजागर करेंगे।
फिलहाल, आलोक शुक्ला की सरेंडर के बाद छत्तीसगढ़ की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक रिटायर्ड अधिकारी, जो कभी सत्ता के गलियारों में राज करता था, आज अपनी गिरफ्तारी का इंतजार कर रहा है। यह मामला न केवल भ्रष्टाचार की गहराई दिखाता है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की जटिलताओं को भी। जांच एजेंसियों पर नजरें टिकी हैं कि वे इस दशक पुराने स्कैम को कैसे सुलझाती हैं।


