खबर वर्ल्ड न्यूज-राकेश पांडेय-जगदलपुर। बस्तर दशहरा में विशालकाय दुमंजिला रथ आकर्षण का केन्द्र होता है। बस्तर दशहरा पर्व के अवसर पर प्रतिवर्ष एक विशालकाय रथ निर्माण किया जाता है। यहां उल्लेखनीय यह है कि रथ के निर्माण करने वालों को अनुसूचित क्षेत्र के रूढ़ि परंपरा के चलते अपने ही समाज से दण्डित किया जाता है, और जुर्माने की अदायगी के बाद पुनः उन्हे अपनी जाति में सम्मिलित किया जाता है। इस तरह की गलती एक बार अथवा भूलवश नहीं बल्कि पिछले कई दशकों से भी अधिक वर्षों से चल रहा है। पिछले कई वर्षों से रथ बनाने वाले प्रतिवर्ष अपने गांव के सामाजिक पंचायत में लगभग दो हजार रुपये का आर्थिक दंड भरते आ रहे हैं। अब यह एक परंपरा बन गई है।
बस्तर के साहित्यकार रुद्रनारायण पाणिग्राही ने बताया कि रियासत काल से ही रथ बनाने का जिम्मा अंचल के सांवरा जाति को सौंपा गया था। लगभग 610 वर्ष से अधिक, बस्तर दशहरा की परम्पराएं किसी न किसी रूप में विद्यमान हैं। प्रत्येक जाति तथा अनुसूचित जाति के लोगों को बस्तर दशहरा पर्व के संपन्नता के लिए ग्रामीणों को अलग-अलग कार्य सौंपा गया है। इसी क्रम में झार उमरगांव और बेड़ा उमरगांव के सांवरा लोगों को रथ निर्माण का कार्य सौंपा गया था। इस कार्य के लिए पूरा का पूरा गांव समर्पित रूप से लगभग एक महीने के लिए घर-परिवार और कृषि कार्य को छोड़कर रथ निर्माण के लिए जगदलपुर पहुंचता था। धीरे-धीरे सांवरा जाति के लोगों की उदासीनता के चलते गिने-चुने लोग ही रथ निर्माण के लिए पहुंचने लगे, जिससे निर्माण की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होने लगी। इस कार्य के लिए लगभग 150 लोंगो की आवश्यकता होती है।
इस संबंध में रथ निर्माण के वर्तमान मुखिया दलपति ने जानकारी दी कि रियासत काल में समर्पण की भावना अलग थी, अब यह कार्य समर्पण की भावना से करना कठिन है। लोग अपने घर बार, खेती-किसानी छोड़कर अगर यहां आते हैं तो साल भर का नुकसान हो जाता है। रथ निर्माण के लिए लोगों को पारिश्रमिक नहीं मिलता, इसलिए संवरा जाति के लोग अपना काम छोड़कर नहीं आते। इन कारणों से अन्य जाति के लोगों से, संवरा जाति के नाम से काम लिया जाता है। जब ये रथ बनाकर अपने गांव लौटते हैं तो अन्य जाति, जनजाति के लोगों को पुनः अपने मूल जाति में सम्मिलित करने के लिए सामाजिक रिवाजों का पालन करना होता है। इसके लिए गांव के मुखिया, पटेल के आदेशानुसार जुर्माना राशि भरना होता है, साथ ही समाज में पुनः सम्मिलित करने के लिए सामाजिक भोज के लिए बकरा भी देना होता है। तब जाकर गंगाजल छिडकर प्रत्येक व्यक्ति का शुद्धिकरण किया जाता है, पश्चात् गांव में प्रवेश करने दिया जाता है।
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