नई दिल्ली। गर्मियों के मौसम में अरावली क्षेत्र में पाया जाने वाला टिमरू का फल स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है, लेकिन इसके पत्ते भी औषधीय गुणों से भरपूर हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञ वैद्य दामोदर प्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार, तेंदू के पत्ते स्किन रोगों, घाव भरने, शुगर कंट्रोल और पेट की गर्मी शांत करने में सहायक होते हैं। इनमें एंटीऑक्सीडेंट और सूजन-रोधी गुण पाए जाते हैं। लू के मौसम में यह शरीर के पित्त को संतुलित कर ठंडक प्रदान करते हैं। हालांकि, शुगर और गंभीर रोगियों को इसके उपयोग से पहले आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
गर्मियों की आहट के साथ ही सिरोही, उदयपुर और अरावली की पहाड़ियों में ‘टिमरू’ (तेंदू) के फलों की बहार आ जाती है। यह फल न केवल अपने स्वाद, बल्कि अरावली क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत के रूप में भी पहचाना जाता है। स्थानीय आदिवासी परिवारों, विशेषकर महिलाओं के लिए यह फल आजीविका का एक बड़ा साधन है, जो इसे जंगलों से एकत्रित कर बाजारों में बेचकर अपनी आय अर्जित करती हैं।
यह फल न केवल स्वाद और सेहत के लिए फायदेमंद है, बल्कि इसके पत्ते भी औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं। हालांकि, व्यावसायिक स्तर पर इन पत्तों का मुख्य उपयोग बीड़ी बनाने के लिए किया जाता है, जिसके लिए वन विभाग द्वारा हर साल बाकायदा टेंडर जारी किए जाते हैं। लेकिन बीड़ी उद्योग के इतर, पारंपरिक चिकित्सा और घरेलू नुस्खों में इन पत्तों का उपयोग कई शारीरिक समस्याओं और तकलीफों से निजात पाने के लिए भी किया जाता है। अरावली के आदिवासी क्षेत्रों में लोग आज भी इसके पत्तों के गुणों को स्वास्थ्य लाभ के लिए पहचानते हैं।
आयुर्वेद के दृष्टिकोण से टिमरू या तेंदू के पत्तों का महत्व अत्यंत गहरा है। सिरोही के सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी और पिछले 40 वर्षों से आयुर्वेद चिकित्सा के क्षेत्र में अनुभवी विशेषज्ञ, वैद्य दामोदर प्रसाद चतुर्वेदी के अनुसार, यह फल जितना पोषक तत्वों से भरपूर है, उतने ही इसके पत्ते भी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी सिद्ध होते हैं। उनके लंबे अनुभव के आधार पर, अरावली की कंदराओं में पाए जाने वाले इन पत्तों में कई ऐसे तत्व मौजूद हैं जो प्राकृतिक चिकित्सा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
आयुर्वेद में टिमरू के पत्तों को स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी बताया गया है। सिरोही के सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद अधिकारी वैद्य दामोदर प्रसाद चतुर्वेदी, जो पिछले 40 वर्षों से आयुर्वेद चिकित्सा में सक्रिय हैं, उन्होंने इसके गुणों पर प्रकाश डाला है। उनके अनुसार, जितना टिमरू का फल फायदेमंद है, उतने ही गुणकारी इसके पत्ते भी होते हैं। इन पत्तों का उपयोग आयुर्वेद में मुख्य रूप से त्वचा (स्किन) से जुड़ी तकलीफों, घावों को जल्दी भरने, दस्त, शुगर और शरीर की गर्मी को कम करने के लिए औषधीय रूप से किया जाता है। इन पत्तों में विशेष रूप से रोगाणुरोधी, एंटीऑक्सीडेंट और सूजन-रोधी गुण पाए जाते हैं। ये तत्व घावों को सुखाने, पेट दर्द में राहत देने और स्किन इन्फेक्शन को कम करने में काफी मददगार साबित होते हैं।
पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में टिमरू के पत्तों का उपयोग सदियों से एक विश्वसनीय औषधि के रूप में किया जाता रहा है। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में घाव और चोट लगने पर इन पत्तों को प्राथमिक उपचार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन या जलन होने पर टिमरू के पत्तों का लेप लगाने से तत्काल राहत मिलती है। इन पत्तों को पीसकर बनाए गए पेस्ट या इनके अर्क (लिक्विड) का लेप प्रभावित स्थान पर करने से दर्द और जलन में काफी कमी आती है। इसके प्राकृतिक हीलिंग गुण संक्रमण को रोकने और जख्म को जल्दी सुखाने में बेहद प्रभावी साबित होते हैं।
तेंदू के पत्तों में मौजूद ‘कॉन्स्टिपेटिंग’ (Constipating) और ‘स्टिप्टिक’ (Styptic) गुणों के कारण इन्हें पेट से जुड़ी विभिन्न समस्याओं के समाधान में बेहद कारगर माना जाता है। वर्तमान में गर्मी का प्रकोप बढ़ने के साथ ही लू लगने का खतरा भी काफी बढ़ गया है। ऐसे में तेंदू के पत्तों का औषधीय उपयोग शरीर की आंतरिक गर्मी को शांत करने में सहायक होता है। ये पत्ते शरीर में बढ़े हुए पित्त दोष को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करते हैं और शरीर को भीतर से ठंडक प्रदान करते हैं।
तेंदू के पत्तों का औषधीय महत्व मधुमेह (शुगर) के प्रबंधन में भी काफी प्रभावी माना जाता है। आयुर्वेद के अनुसार, इन पत्तों में मौजूद तत्व रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में सहायक होते हैं। हालांकि, इसके उपयोग को लेकर सावधानी बरतना भी उतना ही अनिवार्य है। विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर शुगर रोगियों को बिना किसी प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह के इसका सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। चूंकि शुगर लेवल का आवश्यकता से अधिक बढ़ना या घटना, दोनों ही स्थितियाँ स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं, इसलिए दवा की मात्रा और उपयोग का तरीका केवल एक विशेषज्ञ ही सही ढंग से तय कर सकता है।
Trending
- जल जीवन मिशन से बदली ग्राम कुकुरहट्टा की तस्वीर
- रक्षाबंधन के पूर्व जिला कोषालय ने किया प्रस्तुत वेतन देयकों का शत-प्रतिशत भुगतान, अधिकारी-कर्मचारियों में खुशी
- अखंड ब्राह्मण समाज सेवा समिति मुंगेली ने धूमधाम से मनाया सावन उत्सव
- संत शिरोमणि रविदास जी की जन्मभूमि की पवित्र मिट्टी का कलश वितरण कार्यक्रम संपन्न
- राखी से पहले ‘विष्णु भैया’ की सौगात, प्रेम कुंवर के घर आई खुशियों की मिठास
- उप मुख्यमंत्री अरुण साव ‘खेलो इंडिया संवाद’ कार्यक्रम में हुए शामिल
- मुख्यमंत्री ने ‘साइंस ऑन व्हील्स’ को दिखाई हरी झंडी, अब स्कूलों तक पहुंचेगी प्रयोगों की चलती-फिरती विज्ञान शाला
- छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता पर व्यापक मंथन


