बटुक भैरव जयंती हर साल ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान शिव के बाल रूप की पूजा करते हैं। इस तिथि को मां काली के रौद्र रूप को शांत करने के लिए भगवान शिव ने बटुक भैरव का रूप धारण किया था। बटुक भैरव को सतगुण वाला माना जाता है। जो लोग बटुक भैरव की पूजा करते हैं, उनके जीवन में सभी प्रकार के सुख और साधन प्राप्त होते हैं।
बटुक भैरव जयंती 2026 तारीख
वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि 23 जून मंगलवार को शाम 04 बजकर 39 मिनट से प्रारंभ होगी। इस तिथि का समापन 24 जून बुधवार को शाम 06:12 पी एम पर होगा। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर बटुक भैरव जयंती 24 जून बुधवार को मनाई जाएगी।
बटुक भैरव जयंती 2026 मुहूर्त
बटुक भैरव जयंती पर ब्रह्म मुहूर्त 04 बजकर 04 ए एम से लेकर 04 बजकर 44 ए एम तक है। लाभ-उन्नति मुहूर्त सुबह 05:25 ए एम से लेकर सुबह 07:09 ए एम तक है, उसके बाद अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त 07:09 ए एम से 08:54 ए एम तक रहेगा। शुभ-उत्तम मुहूर्त सुबह 10:39 ए एम से दोपहर 12:24 पी एम तक है। उस दिन निशिता मुहूर्त देर रात 12:04 ए एम से 12:44 ए एम तक रहेगा।
बटुक भैरव जयंती पर 3 शुभ योग
बटुक भैरव जयंती के दिन 3 शुभ योग बन रहे हैं। रवि योग तो पूरे दिन रहेगा, वहीं परिघ योग प्रात:काल से लेकर सुबह 10:23 ए एम तक है, फिर शिव योग अगले दिन सुबह तक है। जयंती को प्रात:काल में चित्रा नक्षत्र है, जो दोहपर 01:59 पी एम तक रहेगी, उसके बाद से स्वाति नक्षत्र है।
बटुक भैरव का भोग
इस दिन बटुक भैरव की पूजा के समय उनको बेसन के लड्डू का भोग लगाते हैं। यह उनको बहुत ही प्रिय है।
बटुक भैरव पूजा मंत्र
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाकुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ
बटुक भैरव की पूजा के फायदे
बटुक भैरव को आनंद भैरव भी कहा जाता है। इनकी पूजा करने से सभी प्रकार के सुख और आनंद प्राप्त होते हैं। वहीं भय का नाश होता है।
बटुक भैरव का अवतार
शिव पुत्री अशोकसुंदरी की रक्षा के लिए माता पार्वती ने महाकाली का रौद्ररूप लिया था। वो राक्षस हुंड का वध करने वाली थी, लेकिन अशोकसुंदरी ने हुंड को श्राप दिया था, उनके वर नहुष के हाथों उसका वध होगा। अशोकसुंदरी के श्राप को फलित करने के लिए भगवान शिव ने बटुक भैरव का रूप धारण किया। वे 5 वर्ष के बालक के रूप में प्रकट हुए और मां काली के रास्ते में आ गए, जोर-जोर से रोने लगे। जब मां काली ने उन्हें देखा तो अपने सीने से लगा लिया। उनका वात्सल्य प्रेम जागृत हो गया और वे शांत हो गईं। बाद में नहुष ने हुंड का वध किया।
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