खबर वर्ल्ड न्यूज-राकेश पांडेय-नारायणपुर। जिले के भरंडा गांव में ईसाई धर्म को मानने वाले 26 परिवारों का आरोप है कि ग्रामीणों ने उन्हें गांव छोड़ने का फरमान सुनाया और घरों से बाहर निकाल दिया। ग्रामीणों का कहना है कि यदि ये सभी परिवार मूल धर्म में लौट आए तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। पुलिस और प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद मामला कुछ समय के लिए शांत हो गया था, लेकिन पिछले दो दिनों से धर्मांतरण को लेकर मुद्दा एक बार फिर गरमा गया । प्रशासन और पुलिस की मध्यस्थता में तनावपूर्ण स्थितियों को बीती देर रात शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया। आदिवासियों और ईसाई धर्मांतरितों के बीच समझौता हुआ। जिसके बाद आदिवासियों ने गांव में आकर रहने की सशर्त अनुमति दे दी है। ग्राम भरंडा में यह समझौता इस शर्त पर हुआ है कि, गांव में धर्मांतरितों के कार्यक्रम नहीं होंगे। इनमें प्रार्थना, प्रार्थना के लिए मीटिंग और ईसाई परंपरा के अनुसार कफ़न दफ़न शामिल है। आदिवासियों ने प्रशासन और पुलिस की मध्यस्थता के बीच यह स्पष्ट किया है कि, गांव के भीतर ऐसा कोई भी काम जो कि पारंपरिक आदिवासी रीति रिवाजों, देवी देवताओं और सामाजिक मान्यताओं के अतिरिक्त नहीं होगा।
मिली जानकारी के अनुसार भरंडा गांव में आदिवासियों और धर्मांतरित परिवारों के बीच विवाद हो गया था। आदिवासियों ने करीब 26धर्मांतरित परिवारों को गांव से बाहर निकाल दिया था। आदिवासियों ने ग्रामसभा कर यह फैसला किया था। आदिवासियों ने इन परिवारों को गांव में आकर रहने से रोका तो धर्मांतरित परिवारों ने प्रतिरोध किया था, जिस पर गहमागहमी बढ़ गई थी। हालांकि यह बात बहस तक ही रही, कोई हिंसक झड़प नहीं हुई। ग्राम भरंडा की स्थानीय ग्रामीण फूलबती दूग्गा का कहना है कि हमारे पूर्वज देवी-देवताओं को मानते थे। हम चाहते हैं कि वह भी वही मानें, लेकिन कुछ ग्रामीणों ने ईसाई धर्म अपना लिया है। इसलिए हमने उन्हें यहां से जाने के लिए कहा है। ईसाई धर्म मानने वाले संत राम दुग्गा, चैतू कुमेटी, मनायकु वट्टी समेत अन्य लोगों का कहना है कि वे सालों से गांव में रह रहे हैं, लेकिन अब उन्हें अपने धार्मिक विश्वास के कारण निशाना बनाया जा रहा है। उनका आरोप है कि उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है और उन्हें गांव में रहने नहीं दिया जा रहा है। व्यापक तनाव को देखते हुए प्रशासन और पुलिस बल मौके पर मौजूद रहा और लगातार दोनों पक्षों से बातचीत के बाद समाधान निकाला गया।
बस्तर में तेजी से हाे रहे धर्मांतरण काे लेकर आदिवासियों में काफ़ी नाराज़गी है। नाराज़गी का कारण धर्मांतरण नहीं है, बल्कि यह है कि, धर्मांतरण कर ईसाई हो चुके लोग आदिवासी होने का लाभ ले रहे हैं। आदिवासियों का स्पष्ट मत है कि ईसाई धर्म में प्रोटेस्टेंट कैथोलिक पंथ होते हैं पर आदिवासी ईसाई नहीं होता। धर्मांतरण कर चुके लोगों को आदिवासी होने का दावा और मिलने वाला लाभ गैर धर्मांतरित आदिवासियों के हक को गंभीर नुक़सान पहुंचाता है। गंभीर मतभेद और विवाद की वजह यह भी है कि, धर्मांतरित व्यक्ति का परिवार स्थानीय परंपराओं सामाजिक मान्यताओं का सम्मान नहीं करते और पारंपरिक रीति रिवाजों देवी देवताओं और सामाजिक मान्यताओं का उपहास उड़ाते हैं।
बस्तर में नारायणपुर के भरंडा जैसे गांव कई हैं जहां व्यापक तनाव है। यह तनाव बस्तर के कई हिस्सों में हिंसक संघर्ष का रूप ले चुका है। जानकारों की मानें तो धर्मांतरण का यह मसला नक्सलवाद से भी ज्यादा ख़तरनाक है। बस्तर को करीब से देखने वाला बौद्धिक वर्ग इस बात पर एकमत है कि धर्मांतरण के मसले पर आदिवासियों का आक्रोश बारुद के ढेर जैसा है। सरकार को इस इलाके में विकास के साथ-साथ आदिवासियों के इस आक्रोश को समझना होगा।
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