खबर वर्ल्ड न्यूज-शिव तिवारी-बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता को लेकर इस बार स्कूल शिक्षा विभाग पूरी तरह एक्शन मोड में है। राज्य के 300 स्कूलों से अब प्रोटीन और कैलोरी टेस्ट के लिए पके हुए भोजन का लैब सैंपल लिया जा रहा है। इसके लिए विभाग ने अमरावती की लैब से अनुबंध किया है। उद्देश्य साफ है।बच्चों की थाली में क्या जा रहा है, उसकी सच्चाई की वैज्ञानिक जांच।
विभाग का कहना है कि कई स्कूलों में दाल की कमी के कारण प्रोटीन का स्तर घट रहा है। पिछले साल हर 150 स्कूलों में से करीब 10 प्रतिशत रिपोर्ट निगेटिव आई थीं। इसलिए इस बार सैंपल संख्या दोगुनी कर दी गई है। अगर किसी स्कूल में प्रोटीन और कैलोरी मानक से कम पाए गए, तो संबंधित स्व–सहायता समूहों का अनुबंध तुरंत रद्द कर दिया जाएगा।खास बात यह है कि हर स्कूल में अब ‘चखना रजिस्टर’ अनिवार्य किया गया है। भोजन बनने के बाद सबसे पहले शिक्षक खुद खाना चखेंगे, फिर बच्चों को परोसा जाएगा और इसकी एंट्री रजिस्टर में दर्ज की जाएगी।
हाईकोर्ट भी कई बार मध्याह्न भोजन की खराब गुणवत्ता पर सख्त टिप्पणी कर चुका है। इसके बाद मुख्य सचिव ने गाइडलाइन जारी की थी, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई स्कूल नियत मैन्यू का पालन नहीं कर रहे। बच्चों की पसंद के अनुसार भोजन परोसने का निर्देश भी काग़ज़ों तक सीमित है। राज्य में रोजाना करीब 25 लाख बच्चों को मध्याह्न भोजन मिलता है। इसलिए सैंपल को 24 घंटे के भीतर लैब तक सुरक्षित पहुंचाने की जिम्मेदारी अधिकारियों को दी गई है। एक सैंपल पैकिंग में ही 10 से 12 हजार रुपए खर्च हो रहे हैं।
जिला शिक्षा अधिकारी का कहना है कि, बच्चों को पौष्टिक और स्वच्छ भोजन मिले, इसके लिए लगातार निगरानी की जा रही है। अब देखना यह होगा कि जांच के बाद स्कूल व्यवस्था में सुधार आता है या फिर हालात पहले जैसे ही बने रहते हैं।
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