खबर वर्ल्ड न्यूज-अजय शर्मा-जांजगीर-चांपा। संस्कृत साहित्य की परंपरा पाँच हजार साल से भी अधिक पुरानी है। काव्य और शास्त्र की विविध विधाओं में यह बहुत संपन्न साहित्य है। संस्कृत साहित्य में स्त्री की स्वाधीनता और स्वाधीनता के हनन की सभी स्थितियों की अक्स हैं। इसमें स्वाधीन मन वाली, स्वाधीनता के लिए संघर्ष करती या पुरुष के वर्चस्व के आगे न झुकने वाली स्त्रियों की अनेक छबियाँ हैं। इसके दो कारण हैं। एक, जो वैदिक समाज में संस्कृत साहित्य का निर्माण हुआ उस समय समाज मातृ सत्तात्मक हुआ करती थी। दूसरा यह कारण है कि उसे समय चिंतन और संवेदना के स्तर पर दार्शनिकों एवं कवियों ने स्त्रियों की गरिमा को पहचाना और उसकी स्वाधीनता का सम्मान किया।इस दृष्टि से तीन तरह की स्त्रियाँ संस्कृत साहित्य में देखी जा सकती हैं – एक तो वे जिन्होंने स्वाधीनता को एक मूल्य की तरह आत्मसात कर के उसे अपने जीवन में चरितार्थ किया; दूसरी वे जिन्हें इस मूल्य को हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ा और उसकी कीमत चुकानी पड़ी, तीसरी वे जिनके लिए स्वाधीनता एक सपना बन कर रह गया। यदि वाल्मीकि की रामायण से तीनों के उदाहरण देना हो, तो पहले का उदाहरण कैकेयी, दूसरे का सीता, तारा, मंदोदरी और अहिल्या तथा तीसरे का उदाहरण कौसल्या, सुमित्रा आदि बहुसंख्य नारियाँ हैं। मंत्रों का साक्षात्कार कर सकना या काव्य रच लेना – वैदिक काल में ऐसा कर्म है, जो स्वाधीनता की परम स्थिति को प्रकट करता है। जो स्त्री ऋषि के रूप में मंत्रद्रष्टा हो सकती है, वेद उसके लिए जन्मजात अधिकार बन जाता है।
कौषीतकि ब्राह्मण में बताया गया है कि वेद में पारंगत स्त्रियों को पथ्यस्वस्ति वाक् की उपाधि से सम्मानित किया जाता था। वैदिक यज्ञों में, जहाँ यजमान के साथ उसकी पत्नी की सहभागिता अनिवार्य थी, सीतायज्ञ तथा रुद्रयज्ञ ये दो यज्ञ ऐसे बताए गए हैं, जिनका अनुष्ठान केवल स्त्रियों के द्वारा ही किया जा सकता था। स्त्री अपनी पुरोहित स्वयं है, और अपना कर्मकांड वह स्वयं ही करती है – यह स्थिति वैदिक समाज के भीतर भी मातृसत्ताक समाज की मौजूदगी साबित करती है। मंत्रद्रष्टा स्त्री ऋषियों ने अपने कृतित्व व रचनाशीलता के द्वारा ऋषि के रूप में स्थान प्राप्त की। ऋषि होने का अर्थ अपनी बुद्धि बल की सक्रियता से समाज में सार्थक हस्तक्षेप के लिए स्वाधीन होना भी है। जिन महिला ऋषियों का उल्लेख यहाँ किया गया है, उनमें से कुछ बाद में ब्रह्मवादिनी हो गईं। ब्रह्मवादिनी बुद्धिजीवी महिला है, जो वाद या खुली बहस में शिरकत कर सकती है, शास्त्र रच सकती है या धर्मोपदेश कर सकती है।
पूर्व वैदिक काल में घोषा और इला इसी तरह की महिलाएँ थीं। उपनिषदों में गार्गी, मैत्रेयी, कात्यायनी और सुवर्चला – ये महिलाएँ अपनी जीवनशैली स्वयं चुनती हैं। गार्गी ब्रह्मवादिनी है, वह अकेली याज्ञवल्क्य के सामने उस समय के बुद्धिजीवियों के कदाचित् सब से बड़े जमावड़े बहस में टिकी रहती है। मैत्रेयी घर-बार और अटूट संपदा का त्याग कर याज्ञवल्क्य के साथ जाने का निर्णय लेती है, कात्यायनी अपने पति को छोड़ कर भी इसी घर-बार और ऐश्वर्य मैं रमना पसंद करती है। ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का उल्लेख है, जो पुरुषों के साथ सहज रूप में युद्ध में शरीक होती हैं। स्त्री का हथियार उठाना यहाँ उसका एक स्वैच्छिक कर्म है। ऋग्वेद में विश्पला का वर्णन आया है। विश्पला राजा खेल की रानी थी। वह अपने पति के साथ युद्ध में लड़ी, मुद्गल की पत्नी मुद्ग लानी (इन्द्र सेना) तीरंदाजी में माहिर थी। वह भी मुद्गल के साथ गाएँ चुरा कर ले जाते दस्युओं से भिड़ंत में धनुष-बाण ले कर मैदान में उतरी। वेदों के अंतर्गत पंचविंश ब्राह्मण में (25.13.3) रुशमा की कथा आती है। रुशमा कुरुक्षेत्र की रहने वाली थी, उसने इंद्र से युद्ध किया।ऋग्वेद में ऐसी अनेक महिलाओं का भी वर्णन है, जो अपनी यौनिकता को सहज उन्मुक्त अभिव्यक्ति देती हैं। स्त्री के खुल कर दैहिक संसर्ग की कामना को पुरुष के आगे प्रकट करना उस समय बुरा भी नहीं माना गया। अगस्त्य ऋषि की महत्ता तो संस्कृत के वेदों और पुराणों में ही नहीं, तमिल साहित्य में वर्णित है। संस्कृत साहित्य में प्रयुक्त गृहिणी और दंपती जैसे शब्द घर पर स्त्री के स्वामित्व के बोधक रहे हैं। मातृसत्ताक समाजों में स्त्री अपने घर की मालकिन है, घर का प्रबंध वही करती है, कमाई भी वह अपने पास रखती है।। वेदों और उपनिषदों के समय तक किसी लड़की के द्वारा अपना पति स्वयं चुनना एक सहज बात बनी हुई है। स्वाधीन मन के साथ ही जन्म लेती है। पुरुष या समाज उसकी स्वाधीनता को अक्षुण्ण रहने दे – यह भी संभव है; और जैसा होता रहा है, यह भी कि अपनी वर्जनाओं, पाबंदियों और जड़ नैतिक मान्यताओं के तहत उसकी स्वाधीनता का वह हनन करता जाए। संस्कृत साहित्य महिला सशक्तिकरण कि ऐसे अनेक उदाहरण से भरे हुए हैं।

